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'बच्चों के आंसू कंटेंट नहीं हैं' – डॉ. रिरी त्रिवेदी ने सोशल मीडिया पर पैरेंट्स को दी अहम सलाह

मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट और पैरेंटिंग कोच डॉ. रिरी त्रिवेदी ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट शेयर कर बच्चों की प्राइवेसी और डिजिटल कंसेंट पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि बच्चों के रोने, गुस्सा होने या भावुक होने जैसे निजी पलों को सोशल मीडिया कंटेंट बनाना उनकी भावनात्मक सेहत पर असर डाल सकता है।

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डॉ. रिरी त्रिवेदी ने बच्चों की प्राइवेसी और भावनात्मक सुरक्षा को लेकर माता-पिता से की अहम अपील।

Photo Credit: Instagram

ख़ास बातें
  • डॉ. रिरी त्रिवेदी ने बच्चों के भावुक पलों को कंटेंट बनाने पर जताई चिंता।
  • कहा- रोते हुए बच्चे को कैमरे नहीं, माता-पिता के साथ की जरूरत होती है।
  • पोस्ट ने डिजिटल प्राइवेसी और जिम्मेदार पैरेंटिंग पर नई बहस छेड़ी।

मेंटल हेल्थ प्रोफेशनल, पैरेंटिंग एक्सपर्ट और TEDx स्पीकर डॉ. रिरी त्रिवेदी ने अपने इंस्टाग्राम पर एक पोस्ट शेयर कर सोशल मीडिया पर बच्चों से जुड़े कंटेंट को लेकर अहम मुद्दा उठाया है। उन्होंने कहा कि आज के समय में कई माता-पिता बच्चों के हर पल को रिकॉर्ड कर सोशल मीडिया पर शेयर कर देते हैं, लेकिन बच्चों के भावुक और कमजोर पलों को सार्वजनिक करना सही नहीं है।

'रोते हुए बच्चे कैमरे नहीं, साथ चाहते हैं'

डॉ. त्रिवेदी का कहना है कि जब कोई बच्चा रो रहा हो, परेशान हो या किसी बात से भावुक हो, तब उसे सबसे ज्यादा जरूरत अपने माता-पिता के साथ और सहारे की होती है, न कि कैमरे की। ऐसे समय में वीडियो बनाने के बजाय बच्चे को समझना, शांत करना और उसकी भावनाओं को स्वीकार करना ज्यादा जरूरी है।

उनके मुताबिक, बच्चों के आंसू या गुस्से को सोशल मीडिया कंटेंट में बदल देना उनके आत्मसम्मान और भावनात्मक सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है।

बच्चों की भावनाओं पर पड़ सकता है असर

डॉ. त्रिवेदी ने अपनी पोस्ट में बताया कि अगर बच्चों को बार-बार उनके भावुक पलों में रिकॉर्ड किया जाए, तो धीरे-धीरे वे अपनी भावनाओं को भी कैमरे से जोड़ने लगते हैं। उन्हें लग सकता है कि रोना, गुस्सा होना या उदास होना भी दूसरों को दिखाने वाली चीज है।
 

ऐसी स्थिति में बच्चों के लिए अपनी असली भावनाओं और लोगों का ध्यान पाने के लिए किए जाने वाले व्यवहार के बीच फर्क समझना मुश्किल हो सकता है।

डिजिटल फुटप्रिंट भी है बड़ी चिंता

पोस्ट में बच्चों की डिजिटल प्राइवेसी का मुद्दा भी उठाया गया है। डॉ. त्रिवेदी ने कहा कि आज कई माता-पिता अपने छोटे बच्चों के नाम से सोशल मीडिया अकाउंट चलाते हैं और उनकी तस्वीरें व वीडियो लगातार शेयर करते रहते हैं।

एक बार इंटरनेट पर अपलोड हुआ कंटेंट लंबे समय तक मौजूद रह सकता है। उसे दूसरे लोग डाउनलोड, शेयर या अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर इस्तेमाल भी कर सकते हैं। ऐसे में बच्चे खुद यह तय नहीं कर पाते कि उनकी कौन-सी यादें निजी रहें और कौन-सी सार्वजनिक हों।

पैरेंट्स को क्या करना चाहिए?

डॉ. त्रिवेदी का मानना है कि जब बच्चा भावुक हो, तब उस पल को रिकॉर्ड करने के बजाय उससे बात करें, उसकी भावनाओं को समझें और उसे सुरक्षित महसूस कराएं। ऐसे मौके बच्चों के साथ मजबूत रिश्ता बनाने और उन्हें अपनी भावनाओं को सही तरीके से व्यक्त करना सिखाने का अवसर होते हैं।

उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर लाइक्स और व्यूज़ से ज्यादा जरूरी बच्चों की भावनात्मक सुरक्षा, सम्मान और निजता है।

सोशल मीडिया पर छिड़ी नई बहस

डॉ. रिरी त्रिवेदी की यह पोस्ट सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है। कई लोगों ने उनकी बात का समर्थन करते हुए कहा कि बच्चों की भावनाओं को कंटेंट बनाना सही नहीं है। वहीं इस पोस्ट ने डिजिटल कंसेंट, बच्चों की प्राइवेसी और जिम्मेदार पैरेंटिंग जैसे मुद्दों पर नई चर्चा भी शुरू कर दी है।

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