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जय मदान ने मनाया 'वीव्स ऑफ इंडिया' फेस्टिवल: भारतीय हथकरघा का अनूठा संगम

प्रसिद्ध ज्योतिषी डॉ. जय मदान ने 'वीव्स ऑफ इंडिया' फेस्टिवल में शिरकत की, जहाँ उन्होंने भारत की समृद्ध वस्त्र कला और बुनकरों के कौशल की सराहना की। इस डिजिटल कहानी के जरिए जानें कैसे जय मदान ने हथकरघा उत्पादों को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाने और भारतीय संस्कृति को सहेजने की अपील की।

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जय मदान ने मनाया 'वीव्स ऑफ इंडिया' फेस्टिवल: भारतीय हथकरघा का अनूठा संगम

Photo Credit: Instagram

ख़ास बातें
  • भारतीय हथकरघा और बुनकरों का भव्य उत्सव
  • जय मदान ने जांची साड़ियों की बारीकियां
  • राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर दिया खास संदेश

भारतीय संस्कृति और परंपराओं की जब भी बात होती है, तो डॉ. जय मदान का नाम प्रमुखता से उभरता है। हाल ही में, 'लेडी ऑफ फॉर्च्यून' के नाम से मशहूर जय मदान ने दिल्ली के प्रसिद्ध 'सेंट्रल कॉटेज इंडस्ट्रीज एम्पोरियम' में आयोजित 'वीव्स ऑफ इंडिया' फेस्टिवल का दौरा किया। यह दौरा केवल एक सैर नहीं, बल्कि भारत के उन गुमनाम नायकों हमारे बुनकरों के प्रति एक सम्मान था।

सफेद और गुलाबी रंग की खूबसूरत साड़ी में लिपटी जय मदान जैसे ही एम्पोरियम में दाखिल हुईं, उनके चेहरे पर भारतीय कला के प्रति उत्साह साफ झलक रहा था। उन्होंने कांजीवरम सिल्क, मदुरै की प्रसिद्ध बांधनी और बनारसी जरी के अद्भुत संग्रह को देखा। हर कपड़े की बुनाई और उसके पीछे छिपी मेहनत को जय ने न केवल महसूस किया, बल्कि उनकी बारीकियों को भी समझा।

वीडियो में जय मदान को एक बुनकर के साथ बैठकर लूम पर धागों को पिरोते हुए देखा जा सकता है। उन्होंने असम की पारंपरिक 'मेखला चादर' और हाथ से बनी विभिन्न साड़ियों का ट्रायल भी किया। एक चटख पीले रंग की साड़ी, जिस पर हाथ से बने सुंदर प्रिंट थे, उन पर बेहद फब रही थी।

इस अवसर पर जय मदान ने एक बहुत ही मार्मिक संदेश साझा किया। उन्होंने कहा, "हैप्पी हैंडलूम डे! यह हमारा दिन है, यह हमारी संस्कृति है। जिस तरह हम मदर्स डे, फ्रेंडशिप डे या वैलेंटाइन डे मनाते हैं, उसी तरह हमें हैंडलूम डे भी मनाना चाहिए। लेकिन इसे केवल एक दिन के लिए सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि साल के 365 दिन इसे अपने जीवन का हिस्सा बनाना चाहिए।"

जय मदान ने आगे 'रोटी, कपड़ा और मकान' की अवधारणा पर जोर देते हुए कहा कि कपड़ा हमारी बुनियादी जरूरत है। यदि हम अपनी इस जरूरत को हथकरघा (Handloom) से जोड़ दें, तो न केवल हमारी जीवनशैली बेहतर होगी, बल्कि हमारे देश के लाखों बुनकरों का जीवन भी संवर जाएगा।

उनका यह दौरा डिजिटल दुनिया में एक प्रेरणा की तरह उभरा है। जय मदान ने यह साबित कर दिया कि आधुनिकता के इस दौर में भी हम अपनी जड़ों और अपनी पारंपरिक कला के साथ जुड़े रहकर सबसे ज्यादा 'फैशनेबल' और 'सांस्कृतिक' दिख सकते हैं। यह फेस्टिवल भारतीय वस्त्र मंत्रालय की एक सराहनीय पहल है, जिसे जय मदान जैसी प्रभावशाली शख्सियतों का साथ मिलने से एक नई पहचान मिली है

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