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"यह महिलाओं के लिए कोई देश नहीं है": तालिबान शासित अफगानिस्तान का दौरा कर लौटीं भारतीय ट्रैवल ब्लॉगर शरण्या अय्यर का बड़ा खुलासा

भारतीय ट्रैवल कंटेंट क्रिएटर शरण्या अय्यर ने तालिबान शासित अफगानिस्तान की अपनी 13 दिनों की सोलो यात्रा के अनुभवों को साझा किया है। शरण्या ने बताया कि अफगानिस्तान में महिलाओं के अधिकारों का हनन एक कड़वी और दर्दनाक सच्चाई है। काबुल, बामियान और कंधार की यात्रा के दौरान उन्होंने भारी सुरक्षा चुनौतियों का सामना किया। उन्होंने कहा कि उनका मकसद शासन का समर्थन करना नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों की मार झेल रहे वहां के आम नागरिकों की आर्थिक मदद करना था।

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तालिबान शासित अफगानिस्तान का दौरा कर लौटीं भारतीय ट्रैवल ब्लॉगर शरण्या अय्यर का बड़ा खुलासा

Photo Credit: Instagram

ख़ास बातें
  • बामियान के बुद्ध अवशेषों से लेकर कंधार की तंग गलियों तक
  • जानिए शरण्या अय्यर के इस सबसे खतरनाक सफर की पूरी कहानी
  • शासकों के गुनाहों की सजा आम नागरिक क्यों भुगते

आज के दौर में जहां सोशल मीडिया पर ट्रैवल इन्फ्लुएंसर्स केवल खूबसूरत और सुरक्षित लोकेशंस की तस्वीरें साझा करते हैं, वहीं शरण्या अय्यर ने एक बिल्कुल अलग और जोखिम भरा रास्ता चुना। रवींद्रनाथ टैगोर की 'काबूलीवाला' और खालिद होसैनी के उपन्यासों को पढ़कर बड़ी हुईं शरण्या बचपन से ही अफगानिस्तान की प्राचीन विरासत को देखना चाहती थीं। वर्ष 2021 में तालिबान के दोबारा सत्ता में आने के बाद वहां के हालात पूरी तरह बदल चुके हैं, लेकिन शरण्या ने इन खतरों के बावजूद वहां जाने का फैसला किया।

"यह महिलाओं के लिए देश नहीं है" 

शरण्या ने अपने अनुभव साझा करते हुए दो टूक शब्दों में कहा कि अफगानिस्तान आज के समय में महिलाओं के रहने लायक जगह बिल्कुल नहीं है। उन्होंने देखा कि वहां अफगान महिलाओं के बुनियादी मानवाधिकारों, जैसे शिक्षा और रोजगार पर पूरी तरह से पाबंदी लगा दी गई है। हालांकि, एक विदेशी महिला टूरिस्ट होने के नाते उन्हें कुछ रियायतें मिलीं, लेकिन स्थानीय महिलाओं का जीवन बेहद दर्दनाक है। उन्होंने एक स्थानीय नागरिक का किस्सा भी साझा किया जो अपनी दो बेटियों के भविष्य को बचाने के लिए अफगानिस्तान से भागने के लिए पैसे जुटा रहा था।

बामियान से कंधार तक का सफर और सुरक्षा चुनौतियां

शरण्या की यह यात्रा सामान्य नहीं थी। चूंकि वे वहां फिल्मांकन  कर रही थीं, इसलिए नियमों के अनुसार उन्हें एक अधिकृत स्थानीय गाइड और ड्राइवर को हायर करना पड़ा। उन्होंने हिंदू कुश पर्वतों में स्थित बामियान घाटी का दौरा किया और वहां तालिबान द्वारा नष्ट की जा चुकी बुद्ध की विशाल मूर्तियों के अवशेषों को देखा। इसके अलावा वे तालिबान का गढ़ माने जाने वाले कंधार भी गईं। इस पूरी यात्रा में उन्हें दर्जनों सुरक्षा चौकियों से गुजरना पड़ा और हर जगह कड़े दस्तावेजों की जांच हुई। इस 12-13 दिन की यात्रा में उनका लगभग 2.1 लाख रुपये का खर्च आया।

क्या दमनकारी देशों का पूरी तरह बहिष्कार सही है? 

शरण्या की इस यात्रा ने इंटरनेट पर एक नई बहस छेड़ दी है। कुछ लोग उन पर तालिबान शासन को बढ़ावा देने का आरोप लगा रहे हैं, लेकिन शरण्या का नजरिया अलग है। वर्ष 2022 में ईरान की सोलो यात्रा के दौरान उन्होंने सीखा था कि किसी देश के नागरिकों को वहां के दमनकारी शासन से अलग करके देखा जाना चाहिए।

शरण्या ने सवाल उठाया, "अगर किसी देश की सरकार पूरी तरह से खराब है, तो क्या वहां के निर्दोष नागरिक दुनिया भर के आर्थिक बहिष्कार के हकदार हैं?" उनका मानना है कि जब दुनिया किसी देश को अलग-थलग कर देती है, तो शासकों को कोई फर्क नहीं पड़ता, बल्कि वहां के स्थानीय टूर गाइड, होटल मालिक और हस्तशिल्पकार भूखे मरने की कगार पर आ जाते हैं। हालांकि, उन्होंने साफ चेतावनी दी कि अफगानिस्तान कोई सामान्य वेकेशन स्पॉट नहीं है और यहां केवल बेहद अनुभवी यात्रियों को ही जाने का जोखिम उठाना चाहिए।

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