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बसौड़ा 2026: शीतला अष्टमी का क्या है आध्यात्मिक महत्व? एस्ट्रो इन्फ्लुएंसर प्रवीण शर्मा ने समझाया इसका गहरा अर्थ
क्यों खाते हैं बसौड़ा पर 'बासी' खाना? प्रवीण शर्मा से जानें शीतला अष्टमी की परंपराएं और उनका महत्व
बसौड़ा 2026: एस्ट्रो इन्फ्लुएंसर प्रवीण शर्मा ने बताया शीतला अष्टमी का आध्यात्मिक महत्व
Photo Credit: Instagram
- शीतला अष्टमी: बसौड़ा पर 'बासी' और ठंडा खाना क्यों खाया जाता है?
- ऋतु परिवर्तन में माँ शीतला की पूजा का महत्व और आरोग्य से इसका नाता
- सुरक्षा, संतुलन और परिवार की खुशहाली का प्रतीक हैं ये रस्में
एस्ट्रो इन्फ्लुएंसर प्रवीण शर्मा ने बसौड़ा, जिसे शीतला अष्टमी भी कहा जाता है, के गहरे ब्रह्मांडीय और सांस्कृतिक महत्व को साझा किया है। यह त्योहार आरोग्य, सुरक्षा और मौसमी संतुलन का प्रतीक है। होली के बाद और चैत्र नवरात्रि के करीब आने वाला यह दिन प्राचीन ज्ञान पर आधारित है, जो मानव स्वास्थ्य को ग्रहों की लय और पर्यावरणीय बदलावों के साथ जोड़ता है। प्रवीण शर्मा के अनुसार, बसौड़ा केवल एक रस्म नहीं है, बल्कि भोजन, प्रकृति और कल्याण के बीच के संबंध को याद दिलाने वाला एक ज्योतिषीय सूत्र है।
बसौड़ा में 'बासी' भोजन का महत्व
'बसौड़ा' शब्द 'बासी' या पहले से पकाए गए भोजन से आया है। इस दिन घरों में ताज़ा भोजन नहीं बनाया जाता। इसके बजाय, श्रद्धालु एक शाम पहले ही भोजन तैयार कर लेते हैं और अगली सुबह माँ शीतला को ठंडा नैवेद्य अर्पित करते हैं।
प्रवीण शर्मा बताते हैं कि यह परंपरा प्रतीकात्मक रूप से शरीर और वातावरण को 'ठंडा' करने का प्रतिनिधित्व करती है, क्योंकि इस मौसमी बदलाव के दौरान तापमान बढ़ना शुरू हो जाता है। ज्योतिषीय दृष्टि से, यह अवधि सर्दियों की ऊर्जा से शुरुआती गर्मियों के कंपन में बदलाव का संकेत देती है, इसलिए गर्मी पैदा करने वाले भोजन और खाना पकाने की प्रक्रिया से बचने की सलाह दी जाती है।
माँ शीतला: वैदिक मान्यताओं में आरोग्य की देवी
माँ शीतला को आरोग्य, स्वच्छता और सुरक्षा की देवी के रूप में पूजा जाता है। प्राचीन काल में, परिवारों द्वारा उन्हें चेचक, खसरा और संक्रमण जैसी मौसमी बीमारियों से बचाने के लिए पूजा जाता था, जो ऐतिहासिक रूप से मौसम के उतार-चढ़ाव से जुड़ी रही हैं। प्रवीण शर्मा के अनुसार, यह ग्रहों की उन ऊर्जाओं के ज्योतिषीय विश्लेषण से मेल खाता है जो हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता ,स्वच्छता और सामुदायिक स्वास्थ्य को नियंत्रित करती हैं। दही और ठंडे पकवान अर्पित करके भक्त उस ईश्वरीय शक्ति का सम्मान करते हैं जो बदलते ब्रह्मांडीय चक्रों के दौरान संतुलन बनाए रखती है।
उत्सव की रस्में और उनका ब्रह्मांडीय अर्थ:
बसौड़ा की रस्में ग्रहों के संतुलन की एक सहज समझ को दर्शाती हैं। हल्का और पहले से तैयार भोजन करना शरीर के तापमान को नियंत्रित करने में मदद करता है। माँ शीतला की पूजा स्थिरता, शुद्धता और भावनात्मक मजबूती के संकल्प को दोहराती है। जैसे-जैसे ऋतु चक्र घूमता है, परिवार सुख-समृद्धि, घर की सुरक्षा और आंतरिक संतुलन के लिए आशीर्वाद मांगते हैं।
भक्ति, स्वच्छता और नवीनीकरण का दिन
प्रवीण शर्मा के अनुसार, बसौड़ा सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि एक 'एनर्जेटिक रिसेट' है। यह स्वास्थ्य के प्रति आभार, प्रकृति की लय के प्रति सम्मान और अपने आसपास व आंतरिक स्थिति की शुद्धि को प्रोत्साहित करता है। इन सरल लेकिन गहरे अनुष्ठानों के माध्यम से, भक्त अपने घरों में आरोग्य और दैवीय सुरक्षा को आमंत्रित करते हैं।
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