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बच्चों को सुविधाओं की नहीं, आपकी 'उपस्थिति' की जरूरत है: गौरांग दास ने बताए पेरेंटिंग के नए नियम

गौरांग दास के अनुसार, आज के माता-पिता बच्चों को बेहतरीन सुविधाएं और शिक्षा देने में तो सफल हैं, लेकिन वे अक्सर 'भावनात्मक उपस्थिति' में पीछे छूट जाते हैं। बच्चे उपदेशों से नहीं, बल्कि अपने माता-पिता के आचरण से सीखते हैं। यदि माता-पिता खुद मोबाइल या तनाव में व्यस्त हैं, तो बच्चे भी वही सीखेंगे। सच्ची पेरेंटिंग का अर्थ है बच्चों के लिए एक ऐसा सुरक्षित और प्रेमपूर्ण माहौल बनाना जहाँ उनकी उपलब्धियों से ज्यादा उनके व्यक्तित्व को महत्व दिया जाए।

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बच्चों को सुविधाओं की नहीं, आपकी 'उपस्थिति' की जरूरत है: गौरांग दास ने बताए पेरेंटिंग के नए नियम

Photo Credit: Instagram

ख़ास बातें
  • आचरण का प्रभाव: बच्चे वह नहीं सुनते जो आप कहते हैं, वे उसे देखते हैं
  • भावनात्मक जुड़ाव: भौतिक सुख-सुविधाएं देना काफी नहीं
  • सुरक्षित माहौल

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में, माता-पिता अपने बच्चों को दुनिया की हर खुशी देने की कोशिश कर रहे हैं। वे महंगे स्कूल, गैजेट्स और सुख-सुविधाएं जुटाने में दिन-रात एक कर देते हैं। लेकिन इसी बीच एक बहुत बड़ी कमी रह जाती है, जिसे प्रसिद्ध इस्कॉन संन्यासी गौरांग दास ने उजागर किया है। वे कहते हैं कि अधिकांश घरों में वह 'एक चीज' गायब है जो बच्चों के भविष्य के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है और वह है "माता-पिता का सही आचरण और उनकी भावनात्मक उपस्थिति।"

बच्चे सुनते नहीं, वे नकल करते हैं
गौरांग दास का मानना है कि पेरेंटिंग का सबसे बड़ा नियम यह है कि बच्चे कभी भी आपके 'भाषणों' या 'उपदेशों' से नहीं सीखते। वे एक आईने की तरह होते हैं; वे वही दोहराते हैं जो वे अपने माता-पिता को करते हुए देखते हैं। यदि आप चाहते हैं कि आपका बच्चा मोबाइल कम देखे, तो आपको खुद अपना स्क्रीन टाइम कम करना होगा। यदि आप चाहते हैं कि वह सच बोले, तो आपको खुद ईमानदारी दिखानी होगी। माता-पिता का अपना जीवन ही बच्चे की सबसे पहली और सबसे महत्वपूर्ण पाठ्यपुस्तक है।

सुविधाएं बनाम समय 
गौरांग दास एक बहुत ही महत्वपूर्ण अंतर बताते हैं  'प्रोवाइडिंग' और साथ होना । माता-पिता अक्सर मानते हैं कि उन्होंने बच्चे को महंगा खिलौना दिला दिया, तो उनकी जिम्मेदारी पूरी हो गई। लेकिन बच्चा उस खिलौने से ज्यादा आपके साथ बिताए उस समय की तलाश में है जहाँ आप पूरी तरह से उसके हों। भावनात्मक रूप से अनुपस्थित माता-पिता बच्चों के भीतर एक ऐसा खालीपन छोड़ देते हैं जिसे दुनिया की कोई भी भौतिक वस्तु नहीं भर सकती।

घर का वातावरण: एक सुरक्षित आश्रय
आजकल घर 'परफॉरमेंस सेंटर' बन गए हैं, जहाँ बच्चों पर हमेशा अच्छे नंबर लाने और दूसरों से आगे निकलने का दबाव रहता है। गौरांग दास सलाह देते हैं कि घर को एक ऐसी जगह बनाएं जहाँ बच्चा बिना किसी डर के अपनी गलती स्वीकार कर सके। उसे महसूस होना चाहिए कि उसे उसके 'ग्रेड्स' के लिए नहीं, बल्कि उसके 'अस्तित्व' के लिए प्यार किया जाता है।

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