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दुनिया पर कैसे चला डॉलर का सिक्का? सीए रचना रानडे ने बताया पेट्रोडॉलर के पीछे का अनसुना सच
अमेरिकी डॉलर आज दुनिया की सबसे शक्तिशाली करेंसी है, लेकिन इसकी शुरुआत एक दिलचस्प डील से हुई थी। सीए रचना रानडे ने बताया कि कैसे 1971 में गोल्ड स्टैंडर्ड खत्म होने के बाद, 1974 में अमेरिका ने सऊदी अरब के साथ एक समझौता किया। इसके तहत तेल की हर बिक्री केवल डॉलर में होना तय हुआ। इसी 'पेट्रोडॉलर' सिस्टम ने पिछले 50 सालों से अमेरिका को ग्लोबल इकॉनमी का राजा बना रखा है।
सीए रचना रानडे ने डिकोड किया अमेरिकी डॉलर की ताकत का राज
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- सीए रचना रानडे ने डिकोड किया अमेरिकी डॉलर की ताकत का राज
- दुनिया पर कैसे चला डॉलर का सिक्का
- जिसने बदल दी दुनिया की इकॉनमी
आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था में अमेरिकी डॉलर का दबदबा किसी से छिपा नहीं है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि कागज का एक टुकड़ा पूरी दुनिया की किस्मत कैसे तय करने लगा? मशहूर फाइनेंस एक्सपर्ट और इन्फ्लुएंसर सीए रचना फड़के रानडे ने अपने हालिया वीडियो में डॉलर के ग्लोबल किंग बनने की पूरी कहानी को बहुत ही आसान भाषा में डिकोड किया है।
1971 का ऐतिहासिक फैसला और फिएट करेंसी
रचना रानडे बताती हैं कि 15 अगस्त 1971 की रात को अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन ने एक ऐसी घोषणा की जिसने दुनिया को चौंका दिया। उन्होंने 'गोल्ड स्टैंडर्ड' को खत्म कर दिया, जिसका मतलब था कि अब डॉलर को सोने के बदले नहीं बदला जा सकेगा। इसके बाद डॉलर एक फिएट करेंसी बन गया, जिसकी वैल्यू केवल सरकार के भरोसे और साख पर टिकी थी। अब सवाल यह था कि अगर डॉलर के पीछे सोना नहीं है, तो दुनिया इस पर भरोसा क्यों करे?
तेल का संकट और सऊदी अरब के साथ सीक्रेट डील
1973 में मिडिल ईस्ट में युद्ध छिड़ गया, जिसके विरोध में अरब देशों ने अमेरिका को तेल की सप्लाई बंद कर दी। पेट्रोल पंप सूख गए और अमेरिकी अर्थव्यवस्था संकट में आ गई। तब अमेरिका को समझ आया कि दुनिया पर राज करने के लिए 'तेल' पर कंट्रोल जरूरी है।
1974 में अमेरिकी विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर ने सऊदी अरब के साथ एक समझौता किया। यह डील बहुत सीधी थी: सऊदी अरब अपने तेल की हर बिक्री केवल अमेरिकी डॉलर में करेगा। इसके बदले में, अमेरिका सऊदी शाही परिवार को सैन्य सुरक्षा, हथियार और सुरक्षा की गारंटी देगा।
पेट्रोडॉलर का जन्म और 50 सालों का दबदबा
जल्द ही सऊदी अरब ने ओपेक के बाकी देशों को भी तेल की बिक्री केवल डॉलर में करने के लिए मना लिया। चूंकि दुनिया के हर देश को तेल की जरूरत थी, इसलिए हर देश को तेल खरीदने के लिए डॉलर जमा करने पड़े। यहीं से जन्म हुआ पेट्रोडॉलर का। रचना रानडे के अनुसार, इसी एक समझौते ने अमेरिकी डॉलर को दुनिया की सबसे बड़ी रिजर्व करेंसी बना दिया और पिछले 50 सालों से अमेरिका की वित्तीय मजबूती की नींव रखी।
सीए रचना का यह विश्लेषण हमें समझाता है कि कैसे कूटनीति और अर्थव्यवस्था मिलकर किसी देश को महाशक्ति बनाते हैं। डॉलर का यह इतिहास आज के दौर में और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब दुनिया भर में 'डी-डॉलरइजेशन' की चर्चाएं तेज हो रही हैं।
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