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क्या वाकई लापरवाह है आज की युवा पीढ़ी? अनुष्का राठौड़ से जानिए 'एस्पिरेशन गैप' और महंगे घरों का गणित

क्या आज के युवा सचमुच पैसे उड़ाने में आगे हैं? अनुष्का राठौड़ के इस वीडियो के अनुसार, आसमान छूती रियल एस्टेट की कीमतें, $14\%$ तक की मेडिकल महंगाई और $12\%$ तक की एजुकेशन इन्फ्लेशन ने युवाओं के लिए घर खरीदने जैसे बड़े लक्ष्यों को लगभग असंभव बना दिया है। इसी वजह से युवा भविष्य की बड़ी बचत करने के बजाय आज के छोटे-छोटे सुखों (जैसे ट्रिप्स और स्मार्टफोन) पर खर्च कर रहे हैं, जिसे 'कंपेनसेटरी स्पेंडिंग' कहा जाता है।

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क्या वाकई लापरवाह है आज की युवा पीढ़ी

Photo Credit: Instagram

ख़ास बातें
  • क्या आज के युवा सचमुच लापरवाह हैं
  • जब करोड़ों का घर खरीदना नामुमकिन सा लगने लगे
  • सालाना महंगाई के बीच युवा

अक्सर हमारे समाज में बड़े-बुजुर्ग यह शिकायत करते नजर आते हैं कि आज के युवाओं को परिवार संभालने की कोई फिक्र नहीं है, वे बस ट्रिप पर जाने, बाहर का महंगा खाना खाने, जिम करने और स्मार्टफोन पर पैसे उड़ाने में व्यस्त रहते हैं। लेकिन क्या वाकई यह सिर्फ आज की पीढ़ी की लापरवाही है? इसी विषय पर बात करते हुए प्रसिद्ध फाइनेंशियल इन्फ्लुएंसर अनुष्का राठौड़ ने एक रियलिटी चेक दिया है। उनका कहना है कि यह युवाओं की गलती नहीं, बल्कि उस आर्थिक व्यवस्था  की कमी है जिसमें वे बड़े हो रहे हैं।

बढ़ता हुआ एस्पिरेशन गैप

अनुष्का समझाती हैं कि अर्थशास्त्री एक शब्द का उपयोग करते हैं जिसे 'एस्पिरेशन गैप'  कहा जाता है। इसका मतलब है कि एक इंसान आज आर्थिक रूप से जहां खड़ा है और जहां वह पहुंचना चाहता है (जैसे घर खरीदना या बड़ी बचत करना), उसके बीच का अंतर। अगर यह अंतर थोड़ा कम या संतुलित हो, तो व्यक्ति बचत करने और निवेश करने के लिए प्रेरित होता है क्योंकि उसे अपना भविष्य सुरक्षित दिखता है। लेकिन आज के भारत में युवाओं के लिए यह अंतर बहुत ज्यादा बढ़ चुका है।

घर खरीदना हुआ गणितीय रूप से असंभव

अनुष्का राठौड़ ने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि भारत के अधिकांश महानगरों में घर खरीदना अब एक आम युवा के लिए लगभग नामुमकिन हो गया है। जहां पिछली पीढ़ी अपनी 10 से 15 साल की कमाई में घर ले लेती थी, वहीं आज की स्थिति यह है कि राज्यों की राजधानियों में से  वालों को भी एक साधारण घर के लिए अपनी 30 साल से ज्यादा की बचत लगानी पड़ रही है। यही कारण है कि फॉर्च्यून  पत्रिका के एक सर्वे मे ने माना कि वे चाहे कितनी भी मेहनत कर लें, वे कभी अपने लिए घर नहीं खरीद पाएंगे।

क्या है 'कंपेनसेटरी स्पेंडिंग'? 

जब युवाओं को यह दिखने लगता है कि उनका सबसे बड़ा लाइफ गोल (जैसे घर खरीदना) गणितीय रूप से असंभव हो चुका है, तो वे अपने भविष्य को सुरक्षित करने के बजाय आज को बेहतर बनाने में लग जाते हैं। इसे अर्थशास्त्र की भाषा में 'कंपेनसेटरी स्पेंडिंग'  कहते हैं। यानी, जब आप लाखों-करोड़ों का घर नहीं खरीद सकते, तो आपके पास जो कुछ हजार रुपये बचते हैं, उन्हें आप किसी ट्रिप, अच्छे खाने या स्मार्टफोन पर खर्च कर देते हैं।

इसके साथ ही देश में अमीरों और गरीबों के बीच की खाई लगातार बढ़ रही है, जहां शीर्ष 1% लोगों के पास देश की 40% संपत्ति है। वहीं दूसरी ओर, स्वास्थ्य संबंधी महंगा और शिक्षा की महंगाई आधिकारिक महंगाई दर से कहीं अधिक तेजी से बढ़ रही है। पेपर लीक और अत्यधिक प्रतिस्पर्धा के कारण शिक्षा व्यवस्था का हाल भी चिंताजनक है। अनुष्का अंत में कहती हैं कि भले ही युवाओं को अपने खर्च करने के व्यवहार में सुधार करने की जरूरत है, लेकिन साथ ही हमारे सिस्टम को भी बदलने की जरूरत है ताकि युवाओं को यह महसूस हो सके कि मेहनत करने पर उन्हें उनका हक जरूर मिलेगा।

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