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- "बचपन में जो सिर्फ मनोरंजन थीं, आज ज़िंदगी का आईना हैं" अंकुर वारिको ने शेयर किया 3 फिल्मों का भावनात्मक सफर
"बचपन में जो सिर्फ मनोरंजन थीं, आज ज़िंदगी का आईना हैं" अंकुर वारिको ने शेयर किया 3 फिल्मों का भावनात्मक सफर
मशहूर कंटेंट क्रिएटर अंकुर वारिको ने एक नया वीडियो साझा किया है जिसमें वे तीन ऐसी फिल्मों - उड़ान, वेक अप सिड और पीकू के बारे में बात कर रहे हैं, जिन्हें बड़े होने पर देखने से उनका नज़रिया बदल गया। उन्होंने बताया कि कैसे ये फिल्में बगावत, जिम्मेदारी और माता-पिता के साथ रिश्तों की गहरी समझ देती हैं। यह वीडियो युवाओं और वयस्कों के लिए एक प्रेरणादायक सफर की तरह है जो ज़िंदगी के असली मतलब को समझाता है।
अंकुर वारिको ने बताईं वो 3 फिल्में जो बड़े होने पर अलग लगती हैं
Photo Credit: instagram
- 'उड़ान' फिल्म अब सिर्फ बगावत नहीं, बल्कि सर्वाइवल की कहानी लगती है
- डर नहीं, बल्कि आलस की वजह से दम तोड़ते हैं हमारे अरमान: वारिको
- 'वेक अप सिड' सिखाती है कि कंफर्ट जोन छोड़कर जिम्मेदारी खुद उठानी होगी
क्या आपने कभी गौर किया है कि बचपन की कुछ पसंदीदा फिल्में बड़े होने पर बिलकुल अलग अहसास देती हैं? मशहूर इन्फ्लुएंसर और डिजिटल क्रिएटर अंकुर वारिको ने हाल ही में अपने सोशल मीडिया हैंडल पर एक बहुत ही विचारोत्तेजक और भावनात्मक वीडियो साझा किया है। इस वीडियो में वे उन तीन फिल्मों की चर्चा करते हैं जिन्होंने समय के साथ उनके जीने के नजरिए को बदल दिया है। उनका यह सफर हमें अपनी खुद की जिंदगी के अनुभवों की याद दिलाता है और सोचने पर मजबूर करता है।
उड़ान: सिर्फ़ बगावत नहीं, खामोशी का सफर
अंकुर वारिको बताते हैं कि जब उन्होंने पहली बार विक्रमादित्य मोटवाने की फिल्म 'उड़ान' देखी थी, तो उन्हें लगा था कि यह सिर्फ एक गुस्सैल किशोर की बगावत और घर से भागने की कहानी है। लेकिन अब, जब वे जिंदगी के अलग पड़ाव पर हैं, तो उन्हें इसमें एक गहरा अर्थ नजर आता है। अंकुर के अनुसार, यह फिल्म अब उन्हें सिखाती है कि कैसे 'खामोशी' भी जीने का एक तरीका हो सकती है। वे कहते हैं कि अक्सर हमारे अरमान डर की वजह से नहीं, बल्कि आलस की वजह से दम तोड़ देते हैं। यह फिल्म अब उनके लिए महज एक विद्रोह नहीं, बल्कि सर्वाइवल की एक गहरी कहानी बन गई है।
वेक अप सिड: अपनी राह खुद चुनना
दूसरी फिल्म जिसका अंकुर ने जिक्र किया, वह है 'वेक अप सिड'। उन्होंने बताया कि बचपन में सिड का किरदार उन्हें सिर्फ एक दिशाहीन और आलसी लड़के का लगता था। लेकिन आज उन्हें अहसास होता है कि अपनी 'कंफर्ट ज़ोन' में सालों तक रहना कितना आसान और खतरनाक हो सकता है। अंकुर बहुत ही खूबसूरती से समझाते हैं कि 'बड़ा होना' या 'एडल्टहुड' कोई ऐसी चीज नहीं है जो एक दिन में आ जाती है। यह एक धीमी और निरंतर प्रक्रिया है। वे जोर देकर कहते हैं कि आपके लिए कोई दूसरा बड़ा नहीं हो सकता, आपको अपनी जिम्मेदारी खुद ही उठानी पड़ती है।
पीकू: माता-पिता और उम्र का सच
आखिरी फिल्म है 'पीकू', जो अंकुर को पहले सिर्फ एक कॉमेडी फिल्म लगती थी। लेकिन अब इसे देखते हुए उन्हें यह अहसास होता है कि हमारे माता-पिता वाकई बूढ़े हो रहे हैं। वे कहते हैं कि माता-पिता के साथ रिश्ता जितना जरूरी है, कभी-कभी वह आपको भावनात्मक रूप से थका भी सकता है। अंकुर का यह वीडियो हमें अपनी यादों की गलियों में ले जाता है और सिखाता है कि फिल्में सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि जिंदगी का आईना होती हैं।
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