भोजन छोड़ना, खाने का डर? ऋजुता दिवेकर ने बताए तनाव के कारण
ऋजुता दिवेकर बताती हैं कि लोग स्ट्रेस से निपटते समय तीन आम गलतियाँ करते हैं—घर का बना खाना छोड़ देना, नेचुरल फूड्स से डरना और एक्सट्रीम डाइट्स अपनाना। कहती हैं कि ऐसे कठोर और अनियमित तरीके हार्मोनल बैलेंस को और बिगाड़ देते हैं।
दिवेकभोजन छोड़ना, खाने का डर? ऋजुता र ने बताए तनाव के कारण
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- भोजन छोड़ना और घर का खाना न खाना तनाव बढ़ाता है
- एक्सट्रीम डाइट्स हार्मोनल बैलेंस बिगाड़ देती हैं
- लगातार और सरल आदतें सबसे ज्यादा जरूरी हैं
तेज़-तर्रार फिक्स और एक्सट्रीम डाइट्स की दुनिया में स्ट्रेस धीरे-धीरे हमारी रोज़मर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गया है। कई लोग बेहतर महसूस करने के लिए जटिल रूटीन अपनाते हैं, लेकिन डाइटिशियन ऋजुता दिवेकर एक अलग और आसान नजरिया देती हैं। उनका मानना है कि असली समस्या उन छोटी-छोटी गलतियों में है जो हम स्ट्रेस से निपटते समय करते हैं और उन आदतों से दूर चले जाते हैं जो हमें पहले संतुलित रखती थीं।
असली खाना छोड़ना:
ऋजुता दिवेकर के अनुसार सबसे बड़ी गलती है घर का बना खाना छोड़ देना, सिर्फ डाइटिंग के नाम पर। बहुत से लोग लो-कार्ब डाइट अपनाते हैं, नाश्ता छोड़ देते हैं और सही खाने की जगह कॉफी या सिगरेट जैसी चीज़ें ले लेते हैं। ये चीज़ें आसान या कम कैलोरी वाली लग सकती हैं, लेकिन अक्सर ये स्ट्रेस को कम करने की बजाय बढ़ा देती हैं।
जब शरीर को जरूरी पोषण नहीं मिलता, तो असंतुलन बढ़ जाता है। स्ट्रेस के समय शरीर को रोक-टोक नहीं, बल्कि पोषण की जरूरत होती है।
नेचुरल चीज़ों से डर:
एक और आम गलती है स्थानीय फलों से डरना, सिर्फ शुगर के डर की वजह से। ट्रेंडिंग डाइट्स के चलते लोग मौसमी और स्थानीय खाने की अहमियत भूल जाते हैं। ये चीज़ें न सिर्फ पौष्टिक होती हैं, बल्कि शरीर के लिए पचाना और अपनाना भी आसान होता है।
ऋजुता बताती हैं कि खाने को लेकर बहुत ज्यादा सख्ती और डर रखना नुकसानदायक है। साधारण और नेचुरल चीज़ों को हटाने से चिंता और बढ़ती है, जिससे स्ट्रेस को संभालना मुश्किल हो जाता है।
संतुलन की जगह एक्सट्रीम्स का पीछा:
आजकल की वेलनेस दुनिया लोगों को अक्सर extremes की तरफ ले जाती है। सख्त डाइट और जटिल रूटीन में बैलेंस कहीं खो जाता है। ऋजुता समझाती हैं कि cortisol और हार्मोन बैलेंस के लिए सख्त अनुशासन जरूरी नहीं है, बल्कि कुछ आसान चीजें जरूरी हैं।
लगातार और अपने प्रति दया रखना किसी भी जल्दी के हल से ज्यादा असरदार होता है। शरीर उन रूटीन को बेहतर मानता है जो स्थायी और सरल हों।
साधारण आदतों की ओर वापसी:
असली सीख बहुत सरल है। घर का बना खाना बिना डर के खाएं। अपने शरीर को वो आराम दें जिसकी उसे जरूरत है, खासकर स्ट्रेस के समय। परफेक्शन के पीछे भागने की बजाय छोटे-छोटे ऐसे आदतें बनाएं जो शरीर और मन दोनों को सपोर्ट करें।
कभी-कभी सबसे असरदार समाधान सबसे आसान भी होता है। जैसा कि ऋजुता दिवेकर याद दिलाती हैं—सिर्फ एक गहरी सांस लेना और बेसिक्स पर लौट आना बहुत फर्क डाल सकता है।
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