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अंधविश्वास एक मानसिक नशा है: सद्गुरु ने बताया क्यों खतरनाक है 'बिलीफ'

आध्यात्मिक गुरु सद्गुरु का कहना है कि किसी बात पर बिना सोचे-समझे विश्वास करना 'मानसिक शराब' की तरह है। जिस प्रकार शराब शरीर को अस्थायी सुकून देकर वास्तविकता से दूर ले जाती है, वैसे ही हमारी मान्यताएं (Beliefs) मन को सुन्न कर देती हैं। यह हमें सत्य की गहराई में जाने से रोकती हैं और एक झूठा आश्वासन प्रदान करती हैं। जीवन को सही ढंग से जीने के लिए मान्यताओं के नशे से मुक्त होना और वास्तविकता का सामना करना जरूरी है।

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अंधविश्वास एक मानसिक नशा है: सद्गुरु ने बताया क्यों खतरनाक है 'बिलीफ'

Photo Credit: Instagram

ख़ास बातें
  • मानसिक नशा: सद्गुरु के अनुसार अंधविश्वास 'साइकोलॉजिकल अल्कोहल' है
  • भ्रम का जाल: शराब शरीर पर, तो मान्यताएं सीधे मन पर प्रहार करती हैं
  • सत्य की खोज: विश्वास के बजाय वास्तविकता को जानने पर जोर दें

संसार में अधिकांश लोग किसी न किसी मान्यता या Belief के सहारे जी रहे हैं। कोई धर्म पर विश्वास करता है, कोई विचारधारा पर, तो कोई अपनी धारणाओं पर। हमें सिखाया जाता है कि विश्वास करना एक गुण है। लेकिन प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु और ईशा फाउंडेशन के संस्थापक सद्गुरु इस धारणा पर एक बहुत ही तीखा और तार्किक प्रहार करते हैं। उनका यह छोटा सा वाक्य "विश्वास केवल मनोवैज्ञानिक शराब है" हमारे सोचने के तरीके को पूरी तरह बदलने की क्षमता रखता है।

1. मान्यता: एक 'साइकोलॉजिकल अल्कोहल' 
सद्गुरु एक बहुत ही सटीक तुलना करते हैं। वे कहते हैं कि जब कोई व्यक्ति शराब पीता है, तो उसका शरीर शिथिल हो जाता है और वह अपनी समस्याओं को भूलकर एक काल्पनिक दुनिया में खो जाता है। वह रिलैक्स महसूस करता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उसकी समस्याएं हल हो गई हैं। ठीक उसी प्रकार, जब आप किसी ऐसी बात पर 'विश्वास' कर लेते हैं जिसे आप जानते नहीं हैं, तो आपका मन शांत हो जाता है। यह शांति सत्य के अनुभव से नहीं, बल्कि अज्ञानता के नशे से आती है। इसे ही सद्गुरु 'साइकोलॉजिकल अल्कोहल' कहते हैं।

2. शराब बनाम मान्यता: प्रभाव का अंतर 
सद्गुरु समझाते हैं कि शराब केवल आपके भौतिक शरीर और तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करती है। इसका असर कुछ घंटों में उतर जाता है। लेकिन मान्यता या अंधविश्वास सीधे आपके मन पर काम करता है। यह आपके सोचने, समझने और प्रश्न करने की क्षमता को खत्म कर देता है। एक बार जब आप किसी मान्यता को पकड़ लेते हैं, तो आप उसे बचाने के लिए तर्क गढ़ने लगते हैं और वास्तविकता को देखने से इनकार कर देते हैं। यह नशा शराब से कहीं अधिक स्थायी और विनाशकारी हो सकता है।

3. विश्वास करना आसान है, खोजना कठिन 
मानव मन हमेशा 'सुरक्षा' और 'निश्चितता' की तलाश में रहता है। यह स्वीकार करना कि "मैं नहीं जानता," बहुत साहस का काम है। अधिकांश लोग इस अनिश्चितता से घबराते हैं और किसी रेडीमेड उत्तर या मान्यता को अपना लेते हैं। विश्वास करना बहुत आसान है क्योंकि इसके लिए आपको कुछ करने की जरूरत नहीं होती। लेकिन सत्य की खोज के लिए मेहनत, धैर्य और ईमानदारी चाहिए। सद्गुरु कहते हैं कि विश्वास उस प्रश्न को मार देता है जो आपको सत्य तक पहुँचा सकता था।

4. मान्यताओं के कारण होने वाले संघर्ष
आज दुनिया में जितने भी बड़े संघर्ष, युद्ध और नफरत हैं, उनके मूल में 'मान्यताएं' ही हैं। जब दो लोग अलग-अलग 'नशों'  चूर होते हैं, तो वे एक-दूसरे के दुश्मन बन जाते हैं। सद्गुरु का तर्क है कि यदि लोग मान्यताओं के बजाय 'जानने'  की कोशिश करें, तो दुनिया में शांति होगी। ज्ञान जोड़ता है, जबकि मान्यताएं विभाजित करती हैं।

5. कैसे मुक्त हों इस नशे से? 
इस 'मानसिक शराब' से बाहर निकलने का एकमात्र तरीका है जागरूकता 

  • प्रश्न पूछें: जो भी आपको बताया गया है, उसे तब तक स्वीकार न करें जब तक वह आपके अनुभव में न आए।

  • अज्ञानता को स्वीकार करें: गर्व के साथ कहें कि "मैं नहीं जानता।" यही वह बिंदु है जहाँ से वास्तविक ज्ञान की यात्रा शुरू होती है।

  • तथ्यों पर ध्यान दें: अपनी कल्पनाओं के बजाय उन चीजों पर ध्यान दें जो आपके सामने वास्तविक रूप में मौजूद हैं।

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