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शंख, लाख और बांस का जादुई संगम; परवीन शर्मा ने बताया भारतीय चूड़ियों के पीछे छिपा दिलचस्प इतिहास

भारत के हर राज्य में चूड़ियों की अपनी अनोखी पहचान है। बंगाल में शंख से बनी 'शाखा-पोला', महाराष्ट्र की हरी कांच की चूड़ियाँ और राजस्थान की मशहूर लाख की चूड़ियाँ वहाँ के भूगोल और कला का प्रतीक हैं। आदिवासी क्षेत्रों में बांस तो दक्षिण भारत में मंदिर के गहनों की परंपरा प्रचलित है। यह विविधता दर्शाती है कि कैसे हर क्षेत्र ने अपनी संस्कृति को आभूषणों के माध्यम से संजोया है।

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शंख, लाख और बांस का जादुई संगम; परवीन शर्मा ने बताया भारतीय चूड़ियों के पीछे छिपा दिलचस्प इतिहास

Photo Credit: Instagram

ख़ास बातें
  • क्षेत्रीय संसाधनों का उपयोग
  • संस्कृति और कला का मेल
  • गहनों में छिपा इतिहास

भारत के हर राज्य में चूड़ियों को अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है और उन्हें बनाने की तकनीक भी वहां के भूगोल और संसाधनों पर निर्भर करती है। परवीन शर्मा ने हाल ही में भारतीय चूड़ियों की इसी विविधता को बहुत ही खूबसूरती से समझाया है।

बंगाल का 'शाखा-पोला'
बंगाल की महिलाओं के हाथों में आप अक्सर सफ़ेद और लाल रंग की चूड़ियां देखेंगे, जिन्हें 'शाखा-पोला' कहा जाता है। 'शाखा' सफ़ेद रंग की होती है जो समुद्र से निकलने वाले शंख से बनती है। चूंकि बंगाल समुद्र के करीब है, इसलिए यहाँ शंख प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं।

महाराष्ट्र और हरी कांच की चूड़ियां
महाराष्ट्र में महिलाओं के बीच हरी कांच की चूड़ियां पहनने की गहरी परंपरा है। वेस्टर्न घाट में व्यापार और संसाधनों की उपलब्धता के कारण कांच का काम यहाँ सदियों से प्रसिद्ध रहा है, जिसका प्रभाव यहाँ के आभूषणों पर साफ दिखता है।

राजस्थान की 'लाख' और आदिवासियों का 'बांस'
रेगिस्तानी इलाकों, खासकर राजस्थान में, लाख की चूड़ियां बहुत लोकप्रिय हैं। यहाँ के दस्तकारों  का हुनर इन चूड़ियों के रंगों और पैटर्न्स में झलकता है। वहीं, आदिवासी क्षेत्रों में जहाँ प्रकृति के साथ गहरा जुड़ाव है, बांस  की चूड़ियां बनाई जाती हैं, जो पर्यावरण और सादगी का प्रतीक हैं।

दक्षिण भारत की टेंपल ज्वेलरी
दक्षिण भारत में 'टेंपल ज्वेलरी'  का अपना महत्व है। शुरुआत में ये गहने केवल देवी-देवताओं के लिए बनाए जाते थे, फिर क्लासिकल डांसर्स ने इन्हें अपनाया और धीरे-धीरे ये यहाँ की महिलाओं की पहचान बन गए।

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