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बचत बनाम खर्च: अनुष्का राठौड़ ने समझाया क्यों आज की युवा पीढ़ी घर खरीदने के बजाय ट्रिप्स पर उड़ा रही है पैसे

आज के युवा बचत क्यों नहीं कर पा रहे? फाइनेंस इन्फ्लुएंसर अनुष्का राठौड़ के इस वीडियो के अनुसार, आसमान छूती रियल एस्टेट की कीमतों के कारण युवाओं के लिए घर खरीदना अब 20-30 साल की कमाई का काम बन गया है। जब बड़े वित्तीय लक्ष्य असंभव लगते हैं, तो युवा 'कम्पेंसेटरी स्पेंडिंग' के तहत छोटे खर्चों जैसे ट्रिप्स और गैजेट्स पर पैसे लगाने लगते हैं। हेल्थकेयर और एजुकेशन में क्रमशः 14% और 12% की वास्तविक महंगाई भी इस अंतर को और बढ़ा रही है।

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बचत बनाम खर्च: अनुष्का राठौड़ ने समझाया क्यों आज की युवा पीढ़ी घर खरीदने के बजाय ट्रिप्स पर उड़ा रही है पैसे

Photo Credit: Instagram

ख़ास बातें
  • आज की जेन्ज़ी पीढ़ी
  • अनुष्का राठौड़ ने समझाया 'कम्पेंसेटरी स्पेंडिंग' का विज्ञान
  • 14% मेडिकल और 12% एजुकेशन इन्फ्लेशन के बीच युवाओं के लिए बड़े गोल्स अचीव

अक्सर हमारे समाज में बड़े-बुजुर्ग या अंकल यह शिकायत करते मिल जाते हैं कि आज के युवाओं को बस ट्रिप्स पर जाना है, महंगे होटलों में खाना है और वे बचत करने या परिवार संभालने पर ध्यान नहीं देते। इसी रूढ़िवादी सोच को चुनौती देते हुए फाइनेंस एक्सपर्ट अनुष्का राठौड़ ने एक बेहद तार्किक और आर्थिक दृष्टिकोण पेश किया है, जो बताता है कि गलती युवाओं की आदतों की नहीं, बल्कि उस आर्थिक सिस्टम की है जो उन्हें विरासत में मिला है।

आसमान छूती घर की कीमतें और 'एस्पिरेशन गैप' (The Aspiration Gap)

अनुष्का बताती हैं कि हर भारतीय का सबसे बड़ा सपना अपना एक घर खरीदना होता है। हमारे माता-पिता की पीढ़ी में लोग अपनी 10 से 15 साल की संचित आय से घर खरीद लेते थे। लेकिन आज के समय में स्थिति बदल चुकी है; अब एक सामान्य घर खरीदने के लिए भी 20 से 30 साल की पूरी कमाई लग जाती है, और मेट्रो शहरों में तो यह आम लोगों की पहुंच से पूरी तरह बाहर हो चुका है।

इसी वजह से आज के युवाओं में एक "एस्पिरेशन गैप"  पैदा हो गया है। इसका मतलब है कि एक इंसान आज आर्थिक रूप से जहाँ खड़ा है और जहाँ वह पहुँचना चाहता है, उसके बीच का अंतर बहुत ज्यादा बढ़ गया है। जब यह अंतर सीमित होता है, तब इंसान बचत और निवेश के लिए प्रेरित होता है। लेकिन जब लक्ष्य अवास्तविक लगने लगे, तो युवा पीढ़ी को लगता है कि उनका अपने भविष्य पर कोई कंट्रोल ही नहीं है।

क्या है कम्पेंसेटरी स्पेंडिंग? 

जब बड़े लाइफ गोल्स (जैसे घर खरीदना) गणितीय रूप से नामुमकिन दिखने लगते हैं, तो युवा भविष्य के लिए बड़ी बचत करने के बजाय "कम्पेंसेटरी स्पेंडिंग"  का रास्ता चुनते हैं। इसका मतलब है कि जो पैसा एक घर खरीदने के लिए बहुत कम है, उसे युवा आज को बेहतर बनाने के लिए ट्रिप्स, जिम, अच्छे खान-पान या एक नए स्मार्टफोन पर खर्च कर देते हैं। वे लॉन्ग-टर्म गोल्स के बजाय शॉर्ट-टर्म खुशियों को ऑप्टिमाइज़ करते हैं।

बढ़ती महंगाई का असली आंकड़ा

अनुष्का ने देश की आर्थिक स्थिति के कुछ चौंकाने वाले आंकड़े भी साझा किए:

  • अमीरी-गरीबी का अंतर: देश के टॉप 1% अमीर लोगों के पास पूरे देश की 40% संपत्ति और 22% आय है।

  • वास्तविक महंगाई : हालांकि कागजों पर रिटेल महंगाई करीब 4% दिखती है, लेकिन जमीनी स्तर पर मेडिकल या हेल्थकेयर महंगाई 14%, एजुकेशन (शिक्षा) की महंगाई 12% और रेंट (किराया) की महंगाई 5% से 10% की रफ्तार से बढ़ रही है।

  • एजुकेशन सिस्टम का हाल: पेपर लीक, पुराना पाठ्यक्रम और अत्यधिक कॉम्पिटिशन के कारण युवाओं के लिए एक मजबूत बेस बनाना भी मुश्किल होता जा रहा है।

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