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बच्चों को संपत्ति नहीं, मुस्कुराहट दें: सद्गुरु ने बताया क्या है पेरेंटिंग की सबसे बड़ी जिम्मेदारी?
आध्यात्मिक गुरु सद्गुरु के अनुसार, माता-पिता की सबसे बड़ी जिम्मेदारी अपने बच्चों को सुख-सुविधाएं देना नहीं, बल्कि उनके लिए एक खुशहाल माहौल बनाना है। वे कहते हैं कि बच्चों को कम से कम घर में कभी भी गुस्सा, हताशा या उदासी नहीं देखनी चाहिए। इसके बजाय, उन्हें अपने अभिभावकों में हमेशा प्यार, उल्लास और जीवंतता देखनी चाहिए। यही वह नींव है जिस पर एक स्वस्थ और संतुलित व्यक्तित्व का निर्माण होता है।
बच्चों को संपत्ति नहीं, मुस्कुराहट दें: सद्गुरु ने बताया क्या है पेरेंटिंग की सबसे बड़ी जिम्मेदारी?
Photo Credit: Instagram
- सकारात्मकता: बच्चों के सामने कभी गुस्सा या हताशा वाला चेहरा न दिखाएं
- प्यार का असर: बच्चों को हमेशा प्यार और आनंद से भरा वातावरण मिलना चाहिए
- असली विरासत: माता-पिता का आचरण ही बच्चे के जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है
आज के दौर में पेरेंटिंग एक जटिल चुनौती बन गई है। माता-पिता अपने बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। वे उन्हें बेहतरीन शिक्षा, महंगे गैजेट्स और सुख-सुविधाओं से भरा जीवन देना चाहते हैं। लेकिन इसी आपाधापी में, वे उस सबसे बुनियादी चीज़ को भूल जाते हैं जो एक बच्चे के मानसिक विकास के लिए अनिवार्य है वह है 'घर का वातावरण'। प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु और ईशा फाउंडेशन के संस्थापक सद्गुरु का हालिया संदेश इसी कड़वी सचाई की ओर इशारा करता है।
1. नकारात्मकता का जहर और बचपन
सद्गुरु एक बहुत ही संजीदा सलाह देते हैं "यह सुनिश्चित करें कि आपके बच्चे कभी भी, कम से कम घर में तो, एक गुस्से वाला, हताश या उदास चेहरा न देखें।"
हम अक्सर सोचते हैं कि बच्चों को हमारे तनाव या गुस्से से कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन हकीकत इसके उलट है। बच्चे एक स्पंज की तरह होते हैं; वे अपने आसपास की ऊर्जा को सोखते हैं। जब वे अपने माता-पिता को लगातार झगड़ते, चिल्लाते या अवसाद में देखते हैं, तो उनके अवचेतन मन में डर और असुरक्षा की जड़ें गहरी हो जाती हैं। यह नकारात्मकता उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाती है, जिसे आगे चलकर सुधारना बहुत मुश्किल होता है।
2. प्यार और आनंद का आईना
सद्गुरु का मानना है कि एक बच्चे के लिए सबसे बड़ा उदाहरण उसके माता-पिता होते हैं। यदि आप चाहते हैं कि आपका बच्चा खुश रहे, तो उसे खुशहाल लोगों के बीच पलना होगा। वे कहते हैं कि बच्चों को हमेशा एक 'हंसता हुआ चेहरा' एक 'प्यार भरा चेहरा' और एक 'उल्लासपूर्ण चेहरा' ही देखना चाहिए।
जब बच्चा अपने घर में प्रेम और प्रसन्नता देखता है, तो वह जीवन के प्रति एक सकारात्मक नजरिया विकसित करता है। उसे यह विश्वास मिलता है कि दुनिया एक सुरक्षित और सुंदर जगह है। यही वह मानसिक मजबूती है जो उसे भविष्य की बड़ी चुनौतियों से लड़ने के लिए तैयार करती है।
3. सुविधाएं बनाम संवेदनाएं
लेख का एक मुख्य सार यह है कि भौतिक चीज़ें कभी भी भावनात्मक जुड़ाव की जगह नहीं ले सकतीं। आप बच्चे को दुनिया का सबसे महंगा खिलौना दिला दें, लेकिन यदि आप उसे एक मुस्कुराहट और शांतिपूर्ण माहौल नहीं दे पा रहे हैं, तो वह खिलौना व्यर्थ है। सद्गुरु हमें याद दिलाते हैं कि हम बच्चों के लिए एक 'उदाहरण' पेश कर रहे हैं। हम अपने व्यवहार से उन्हें सिखा रहे हैं कि समस्याओं का सामना कैसे किया जाता है। यदि हम हर समस्या पर 'रिएक्ट' करेंगे, तो वे भी वही सीखेंगे।
4. सचेत अभिभावक बनें
सद्गुरु की यह सीख हमें 'सचेत' होने के लिए प्रेरित करती है।
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आत्म-नियंत्रण: घर की चौखट के भीतर कदम रखते ही अपने बाहरी तनाव को वहीं छोड़ दें।
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भावनात्मक बुद्धिमानी: अपने गुस्से और हताशा को बच्चों के सामने प्रकट करने के बजाय उसे व्यक्तिगत रूप से मैनेज करना सीखें।
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उपस्थिति का महत्व: आपके बच्चे को आपके बैंक बैलेंस से ज्यादा आपकी 'उपस्थिति' और 'ऊर्जा' की जरूरत है।
5. बच्चों के लिए सबसे बड़ा योगदान
सद्गुरु अंत में एक बहुत ही प्रभावशाली बात कहते हैं "अपने बच्चे के लिए आप जो सबसे बड़ा काम कर सकते हैं, वह है खुद को एक आनंदमय इंसान बनाना।" एक खुशहाल माँ या पिता अपने बच्चों को बिना कहे ही जीवन के सबसे बड़े सबक सिखा देते हैं। संस्कार भाषणों से नहीं, बल्कि आचरण से दिए जाते हैं।
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