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प्यार की ताकत और 250 किलो का बोझ: मतियास स्टाइनर की वो जीत जिसने दुनिया को रुला दिया

जर्मन वेटलिफ्टर मतियास स्टाइनर ने अपनी पत्नी सुज़ैन से ओलंपिक गोल्ड मेडल जीतने का वादा किया था। 2008 बीजिंग ओलंपिक से कुछ महीने पहले एक कार हादसे में सुज़ैन की मृत्यु हो गई। मतियास पूरी तरह टूट चुके थे, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने बीजिंग में हिस्सा लिया और अपने आखिरी प्रयास में करीब 250 किलो वजन उठाकर स्वर्ण पदक जीता। पोडियम पर अपनी पत्नी की तस्वीर पकड़े उनकी वह छवि आज भी दुनिया के लिए प्यार और अटूट संकल्प की मिसाल है।

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प्यार की ताकत और 250 किलो का बोझ: मतियास स्टाइनर की वो जीत जिसने दुनिया को रुला दिया

Photo Credit: Instagram

ख़ास बातें
  • अटूट वादा: मतियास ने अपनी पत्नी से ओलंपिक गोल्ड जीतने का वादा किया था
  • दुःखद हादसा: खेल से ठीक पहले पत्नी की कार एक्सीडेंट में दर्दनाक मौत
  • ऐतिहासिक जीत: आखिरी प्रयास में 250 किलो उठाकर पत्नी का सपना किया पूरा

खेलों की दुनिया में जीत और हार के कई किस्से हैं, लेकिन कुछ कहानियाँ ऐसी होती हैं जो समय की सीमाओं को लांघकर अमर हो जाती हैं। ऐसी ही एक कहानी है जर्मन वेटलिफ्टर मतियास स्टाइनर की। अंकुर वारिकू ने अपने हालिया वीडियो में इस भावुक कहानी को फिर से जीवित किया है, जो हमें सिखाती है कि जब इंसान के पास कोई बड़ा कारण होता है, तो वह किसी भी बाधा को पार कर सकता है।

1. एक खूबसूरत वादा और एक भयानक रात 
मतियास स्टाइनर और उनकी पत्नी सुज़ैन की प्रेम कहानी बहुत गहरी थी। मतियास ने अपनी पत्नी से एक वादा किया था कि वे एक दिन ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीतकर दिखाएंगे। सुज़ैन उनकी सबसे बड़ी सपोर्टर थीं। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। 2008 के बीजिंग ओलंपिक से मात्र कुछ महीने पहले, एक भयानक कार एक्सीडेंट में सुज़ैन की जान चली गई।

मतियास के लिए यह केवल एक व्यक्तिगत क्षति नहीं थी; उनका मानसिक संतुलन और उनके करियर का आधार हिल गया था। वे खुद से सवाल कर रहे थे कि क्या वे इस खेल को जारी रखें या छोड़ दें।

2. बीजिंग ओलंपिक 2008: हार के मुहाने पर 
तमाम मानसिक पीड़ा के बावजूद, मतियास ने बीजिंग ओलंपिक में हिस्सा लेने का फैसला किया। उनका मकसद केवल जीतना नहीं, बल्कि उस वादे को पूरा करना था जो उन्होंने अपनी पत्नी से किया था। लेकिन प्रतियोगिता उनके लिए आसान नहीं रही।

फाइनल राउंड में, मतियास अपने पहले दो प्रयासों में असफल रहे। पूरा स्टेडियम और दुनिया उन्हें देख रही थी। उन पर दबाव असहनीय था। यदि वे तीसरा प्रयास भी विफल कर देते, तो गोल्ड मेडल का सपना हमेशा के लिए खत्म हो जाता।

3. वो आखिरी मौका और 250 किलो का वजन 
अपने तीसरे और आखिरी प्रयास में, मतियास को करीब 250 किलोग्राम वजन उठाना था। यह वो वजन था जिसे उन्होंने अपनी जिंदगी में पहले कभी नहीं उठाया था। यह उनके शारीरिक सामर्थ्य से कहीं ज्यादा था।

अंकुर वारिकू बताते हैं कि उस क्षण मतियास के दिमाग में केवल उनकी पत्नी का चेहरा और वो वादा था। जैसे ही उन्होंने चिल्लाते हुए और पूरी जान लगाते हुए उस लोहे के भारी बोझ को अपने सिर के ऊपर उठाया, पूरा बीजिंग स्टेडियम गूँज उठा। उन्होंने वो कर दिखाया था जो असंभव लग रहा था। मतियास स्टाइनर अब ओलंपिक गोल्ड मेडलिस्ट बन चुके थे।

4. पोडियम पर वो ऐतिहासिक पल
जब मतियास मेडल लेने के लिए पोडियम पर चढ़े, तो उनकी आँखों में आंसू थे। उन्होंने एक हाथ में अपना गोल्ड मेडल पकड़ा था और दूसरे हाथ में अपनी पत्नी सुज़ैन की तस्वीर। उन्होंने दुनिया को दिखाया कि यह मेडल उनका नहीं, बल्कि उनकी पत्नी का है। वह पल खेल इतिहास के सबसे भावुक पलों में दर्ज हो गया।

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