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सद्गुरु की पैरेंटिंग सलाह: बच्चों पर प्यार के नाम पर दबाव न बनाएं

सद्गुरु ने हाल ही में पैरेंटिंग को लेकर अपनी राय साझा करते हुए एक अहम मुद्दे पर चर्चा छेड़ दी है। एक वीडियो में उन्होंने माता-पिता को सलाह दी कि वे अपने अधूरे सपनों का बोझ बच्चों पर न डालें और उन्हें अपनी संपत्ति की तरह न समझें। उन्होंने कहा कि बच्चों को नियंत्रित करने के बजाय उन्हें भावनात्मक सहारा, समझ और भरोसा देना ज़्यादा ज़रूरी है। सद्गुरु के अनुसार, ऐसा सकारात्मक और प्यार भरा माहौल बनाना चाहिए, जहाँ बच्चे खुद को समझा हुआ और सम्मानित महसूस करें तथा अपनी पहचान के साथ स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ सकें।

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सद्गुरु की चेतावनी: अपने सपनों का बोझ बच्चों पर न डालें

Photo Credit: Instagram

ख़ास बातें
  • सद्गुरु ने माता-पिता को बच्चों पर प्यार के नाम पर दबाव न बनाने की सलाह दी
  • उन्होंने कहा कि माता-पिता बच्चों के दोस्त बनें, उनके बॉस या सिर्फ आदेश
  • बच्चों के विकास के लिए प्यार, भरोसे और डर-मुक्त माहौल को सबसे ज़रूरी बताय

हाल ही में एक यूट्यूब वीडियो में सद्गुरु ने पैरेंटिंग की एक आम गलती पर बात की। उन्होंने कहा कि कई बार प्यार धीरे-धीरे दबाव में बदल जाता है। जो चीज़ देखभाल और चिंता से शुरू होती है, वह बच्चों पर अनावश्यक उम्मीदों का बोझ डाल सकती है।

जब प्यार दबाव बन जाता है

सद्गुरु ने कहा कि कई माता-पिता अनजाने में अपने बच्चों पर बोझ डाल देते हैं, जब वे उनसे अपने अधूरे सपने पूरे करने की उम्मीद करते हैं। उन्होंने कहा, “अपने बच्चों की ज़िंदगी को दुखी मत बनाइए, उनसे अपने सपने पूरे करने की उम्मीद मत रखिए।” उनके अनुसार, पैरेंटिंग तब गलत दिशा में चली जाती है जब बच्चों को एक अलग व्यक्ति मानने के बजाय माता-पिता का विस्तार समझ लिया जाता है।

बच्चे कोई संपत्ति नहीं हैं

इस बात पर ज़ोर देते हुए कि बच्चे किसी की संपत्ति नहीं होते, सद्गुरु ने कहा कि माता-पिता को ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए जैसे वे अपने बच्चों के मालिक हों। उन्होंने सलाह दी कि बच्चों के साथ प्यार और समझदारी का रिश्ता बनाना चाहिए। “अपने बच्चे के बॉस मत बनिए,” उन्होंने कहा। उनके अनुसार, बच्चों को हर समय डांट-फटकार या अनुशासन से ज़्यादा दोस्ती, अपनापन और भावनात्मक सहारे की ज़रूरत होती है।

समय के साथ प्रभाव बदल गया है

सद्गुरु ने यह भी कहा कि आज के समय में बच्चों पर सिर्फ माता-पिता का प्रभाव नहीं होता। सोशल मीडिया, दोस्त और डिजिटल कंटेंट भी उनकी सोच को प्रभावित करते हैं। ऐसे माहौल में बहुत ज़्यादा नियंत्रण या डर के आधार पर की गई पैरेंटिंग बच्चों को मार्गदर्शन देने के बजाय उनसे दूरी बढ़ा सकती है।

भरोसा बनाइए, डर नहीं

उन्होंने कहा कि अगर बच्चों को घर में हर समय जज किए जाने या नियंत्रित किए जाने का एहसास होगा, तो वे अपना सुकून कहीं और तलाशने लगेंगे। इसलिए माता-पिता को ऐसा माहौल बनाना चाहिए, जहां बच्चे खुलकर अपनी बात कह सकें। सद्गुरु के अनुसार, सख्त नियमों से ज़्यादा भरोसा और समझ बच्चों के विकास में मदद करते हैं।

सकारात्मक माहौल की ताकत

सद्गुरु ने कहा कि बच्चे अपने घर के भावनात्मक माहौल को बहुत जल्दी अपनाते हैं। प्यार, स्थिरता और शांति से भरा वातावरण उनके व्यक्तित्व को भाषणों और सलाहों से कहीं अधिक प्रभावित करता है। उन्होंने कहा, “उन्हें खुशी और प्यार के माहौल में बढ़ने दीजिए।”

पैरेंटिंग एक सौभाग्य है

अपने संदेश के अंत में सद्गुरु ने कहा कि पैरेंटिंग मालिकाना हक नहीं, बल्कि एक सौभाग्य है। उन्होंने माता-पिता से बच्चों को नियंत्रित करने के बजाय उनका मार्गदर्शन करने की अपील की। उनका कहना था कि बच्चे अपने माता-पिता के माध्यम से इस दुनिया में आते हैं, लेकिन वे उनकी संपत्ति नहीं होते। उनका साफ संदेश था कि सच्ची पैरेंटिंग दबाव में नहीं, बल्कि सहयोग और समर्थन में छिपी है।

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