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80% ऑटोइम्यून मरीज महिलाएं हैं, जिसका संबंध भावनाओं को दबाने और अत्यधिक तनाव से है
नमिता थापर ने महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरी चिंता जताते हुए खुद को प्राथमिकता देने की सलाह दी है। उन्होंने बताया कि 80% ऑटोइम्यून मरीज महिलाएं हैं, जिसका मुख्य कारण अपनी भावनाओं को दबाना और दूसरों को खुश करने की कोशिश में 'ना' न कह पाना है। नमिता के अनुसार, मानसिक तनाव और दबा हुआ गुस्सा शरीर को गंभीर रूप से बीमार बना सकता है, इसलिए बिना किसी अपराधबोध के अपनी सीमाएं तय करना जरूरी है।
80% ऑटोइम्यून मरीज महिलाएं हैं, जिसका संबंध भावनाओं को दबाने और अत्यधिक तनाव से है
Photo Credit: Instagram
- दबी भावनाएं महिलाओं में बीमारी बढ़ातीं
- बिना गिल्ट के 'ना' कहना सीखें
- खुद को प्राथमिकता देना बेहद ज़रूरी
शार्क टैंक इंडिया' की मशहूर जज और सफल उद्यमी नमिता थापर ने हाल ही में महिलाओं के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को लेकर एक ऐसी बात कही है, जिसने सोशल मीडिया पर बहस छेड़ दी है। उन्होंने एक चौंकाने वाले आँकड़े के साथ बताया कि कैसे हमारी परवरिश और 'हमेशा दूसरों को खुश रखने' की चाहत हमें धीरे-धीरे बीमार बना रही है।
80% ऑटोइम्यून मरीज महिलाएं ही क्यों?
नमिता थापर ने अपने इंस्टाग्राम पर एक वीडियो साझा करते हुए एक बेहद गंभीर सवाल उठाया। उन्होंने बताया कि दुनिया भर में ऑटोइम्यून बीमारियों से जूझने वाले मरीजों में से 80% महिलाएं हैं। यह सिर्फ एक संयोग नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक गहरा मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारण छिपा है।
नमिता के अनुसार, बचपन से ही लड़कियों को 'पीपल प्लीज़र' बनने के लिए तैयार किया जाता है। उन्हें सिखाया जाता है कि वे सबकी देखभाल करें, सबकी खुशियों का ख्याल रखें और 'ना' कहना एक बुरी बात है। यही कंडीशनिंग बड़े होने पर महिलाओं के लिए मुसीबत बन जाती है।
दबी हुई भावनाएं और बीमारियों का विज्ञान
जब एक महिला अपनी जरूरतों को दबाती है और दूसरों को खुश करने के लिए अपनी इच्छाओं का गला घोंटती है, तो वह अनकही 'ना' कहीं गायब नहीं होती। नमिता ने शोधकर्ताओं के हवाले से बताया कि जब आप अपनी भावनाओं को व्यक्त नहीं करते, तो वे शरीर के अंदर जमा होने लगती हैं।
वैज्ञानिक रूप से, लगातार मानसिक तनाव, नकारात्मकता और भावनात्मक बोझ शरीर में 'कोर्टिसोल' के स्तर को बढ़ा देते हैं। इसके कारण शरीर के अंदरूनी हिस्सों में सूजन पैदा होती है, जो समय के साथ गंभीर ऑटोइम्यून बीमारियों का रूप ले लेती है। सरल शब्दों में कहें तो, जो बात आप जुबान से नहीं कह पाते, उसे आपका शरीर बीमारी के रूप में कहना शुरू कर देता है।
खुद को प्राथमिकता देना स्वार्थ नहीं है
मई का महीना 'मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता माह' के रूप में मनाया जाता है। इस मौके पर नमिता ने महिलाओं को एक कड़ा संदेश दिया है। उन्होंने कहा कि खुद को प्राथमिकता देना कोई बुरी बात नहीं है।
उन्होंने महिलाओं से आग्रह किया कि वे अपनी सीमाएं तय करना सीखें। अगर कोई काम या स्थिति आपकी मानसिक शांति छीन रही है, तो बिना किसी अपराधबोध के 'ना' कहना सीखें। अपनी जरूरतों का ख्याल रखना और अपनी आवाज उठाना ही बेहतर स्वास्थ्य की पहली सीढ़ी है।

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