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खुशी और गम में क्यों बदल जाती है समय की रफ़्तार? सद्गुरु का दिलचस्प विश्लेषण
आध्यात्मिक गुरु सद्गुरु के अनुसार, समय की गति स्थिर नहीं है, बल्कि यह हमारी मानसिक स्थिति पर निर्भर करती है। उन्होंने एक मज़ेदार उदाहरण दिया कि एक मिनट की लंबाई इस बात से तय होती है कि आप बाथरूम के दरवाजे के अंदर हैं या बाहर। जब हम पीड़ा या दुख में होते हैं, तो वक्त कटता नहीं है, लेकिन जब हम अत्यंत प्रसन्न और आनंदित होते हैं, तो समय उड़ जाता है। हमारी आंतरिक स्थिति ही हमारे 'समय' का निर्माण करती है।
खुशी और गम में क्यों बदल जाती है समय की रफ़्तार? सद्गुरु का दिलचस्प विश्लेषण
Photo Credit: Instagram
- दिलचस्प मिसाल: एक मिनट कितना लंबा है, यह बाथरूम के दरवाजे पर निर्भर है
- मानसिक अवस्था: जब आप दुखी होते हैं, तो समय पहाड़ जैसा लगने लगता है
- आनंद का जादू: परमानंद (Ecstasy) की स्थिति में वक्त पलक झपकते ही बीत जाता
हम बचपन से पढ़ते आ रहे हैं कि एक मिनट में 60 सेकंड होते हैं और एक घंटे में 60 मिनट। घड़ी की सुइयां सबके लिए एक ही रफ़्तार से चलती हैं। लेकिन क्या अनुभव के स्तर पर भी ऐसा ही है? प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु और ईशा फाउंडेशन के संस्थापक सद्गुरु ने समय और मानव चेतना के बीच के इस रहस्यमयी रिश्ते को एक बहुत ही सरल और मज़ेदार उदाहरण से समझाया है। उनका यह विचार हमें यह समझने में मदद करता है कि हम अपने जीवन को कैसे 'जीते' हैं।
1. बाथरूम का दरवाजा और समय की परिभाषा
सद्गुरु कहते हैं, "एक मिनट कितना लंबा होता है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप बाथरूम के दरवाजे के किस तरफ खड़े हैं।"
यदि आप दरवाजे के अंदर हैं और आराम से अपना काम कर रहे हैं, तो आपके लिए एक मिनट कुछ भी नहीं है। आप बाहर इंतज़ार करने वाले से कहेंगे बस एक मिनट रुको।" लेकिन जो व्यक्ति दरवाजे के बाहर खड़ा है और जिसका ब्लैडर पूरी तरह भरा हुआ है, उसके लिए वह एक मिनट एक साल से भी ज्यादा लंबा और कष्टकारी हो सकता है। यह उदाहरण हमें सिखाता है कि समय 'भौतिक' नहीं, बल्कि 'मानसिक' है।
2. दुख: समय का विस्तार
जब हम तनाव, चिंता, दुख या पीड़ा में होते हैं, तो हमारे दिमाग की कार्यप्रणाली ऐसी हो जाती है कि हमें हर पल का अहसास बहुत गहराई से होता है। आपने गौर किया होगा कि बीमारी के समय एक रात गुजारना भी भारी पड़ता है। सद्गुरु समझाते हैं कि यदि आप खुद को दुखी रखते हैं, तो आपका जीवन बहुत लंबा महसूस होगा। लोग अक्सर लंबी उम्र की कामना करते हैं, लेकिन यदि वे दुखी हैं, तो वे केवल 'पीड़ा' को लंबा खींच रहे हैं। दुख में समय एक बोझ बन जाता है।
3. आनंद: समय का उड़ जाना
सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि जब आप 'एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी' खुशी या आनंद की स्थिति में होते हैं, तो समय 'गायब' हो जाता है। जब आप किसी प्रियजन के साथ होते हैं, अपनी पसंद का काम कर रहे होते हैं, या ध्यान की गहरी अवस्था में होते हैं, तो घंटों कैसे बीत जाते हैं, पता ही नहीं चलता। सद्गुरु के अनुसार, यही असली जीवन है। जब आप पूरी तरह जीवंत होते हैं, तो समय आपके ऊपर हावी नहीं हो पाता।
4. चेतना और समय का प्रबंधन
सद्गुरु का यह दर्शन हमें समय प्रबंधन के बजाय चेतना प्रबंधन की सलाह देता है। हम अपनी घड़ी को तो कंट्रोल नहीं कर सकते, लेकिन हम अपनी आंतरिक स्थिति को जरूर नियंत्रित कर सकते हैं।
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यदि आप हर पल को उत्सव की तरह जीते हैं, तो आप महसूस करेंगे कि जीवन बहुत छोटा है और आपको बहुत कुछ करना है।
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यदि आप हर बात पर 'रिएक्ट' करते हैं और तनाव पालते हैं, तो आपको लगेगा कि जीवन एक अंतहीन संघर्ष है।
5. जीवन की गुणवत्ता बनाम लंबाई
लेख का सार यह है कि हमें इस बात की चिंता नहीं करनी चाहिए कि हम कितने साल जिएंगे। महत्वपूर्ण यह है कि हमने कितने पल 'जागरूकता' और 'प्रसन्नता' के साथ बिताए हैं। एक व्यक्ति जो 100 साल तक दुखी होकर जीता है, वह उस व्यक्ति से कहीं पीछे है जिसने 10 साल पूरी जीवंतता और उल्लास के साथ बिताए हैं।
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