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मास्टरशेफ पंकज भदौरिया का छलका दर्द: कीमोथेरेपी और बालों के झड़ने ने तोड़ी हिम्मत

मास्टरशेफ इंडिया की पहली विजेता पंकज भदौरिया ने अपनी स्वास्थ्य समस्याओं और कीमोथेरेपी के दौरान होने वाले दर्दनाक अनुभवों को साझा किया है। उन्होंने बताया कि कैसे बालों का झड़ना उनके लिए भावनात्मक रूप से टूटने वाला क्षण था।

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Pankaj Bhadouria

Photo Credit: Instagram

ख़ास बातें
  • कैंसर के इलाज और कीमोथेरेपी का संघर्ष
  • बालों के झड़ने से रुकीं सांसें
  • पंकज भदौरिया का स्वास्थ्य

भारत की पहली मास्टरशेफ विजेता पंकज भदौरिया (Pankaj Bhadouria) अक्सर अपनी रसोई और स्वादिष्ट पकवानों के जरिए लोगों के चेहरे पर मुस्कान लाती हैं। लेकिन हाल ही में उन्होंने अपनी जिंदगी के एक ऐसे कठिन दौर के बारे में बात की है, जिसे जानकर उनके प्रशंसक दंग रह गए। पंकज ने अपनी सेहत से जुड़ी गंभीर समस्याओं और कीमोथेरेपी (Chemotherapy) के दौरान होने वाले असहनीय शारीरिक और मानसिक दर्द को साझा किया है।

पंकज भदौरिया ने उस पल को याद किया जिसने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया था। कीमोथेरेपी के दौरान होने वाले साइड इफेक्ट्स के बारे में बात करते हुए उन्होंने अपने बालों के झड़ने (Hair Loss) का ज़िक्र किया। उन्होंने बहुत ही भावुक होकर कहा, "जब मैंने अपने बालों को गिरते हुए देखा, तो उस समय के लिए मेरी सांसें रुक गई थीं (It stopped my breath)।

पंकज के लिए यह केवल शारीरिक बदलाव नहीं था, बल्कि एक ऐसी स्थिति थी जिसने उन्हें मानसिक रूप से कमजोर कर दिया था। एक महिला के लिए उसके बाल उसकी सुंदरता और पहचान का प्रतीक होते हैं, और इलाज की प्रक्रिया में उन्हें खोना बहुत बड़ा भावनात्मक आघात होता है। पंकज ने बताया कि उस समय उन्हें महसूस हुआ कि वे अपनी पहचान खो रही हैं।

 पंकज भदौरिया ने बताया कि कैसे उन्होंने अपनी इस पीड़ा को स्वीकार किया और फिर से खुद को खड़ा किया। कीमोथेरेपी की थकान, शरीर में होने वाले दर्द और आईने में खुद को बदलते हुए देखना यह सब उन्होंने बहुत बहादुरी से झेला। उन्होंने यह महसूस किया कि बीमारी केवल शरीर को प्रभावित करती है, लेकिन आपकी आत्मा और आपकी हिम्मत को नहीं तोड़ सकती।

पंकज ने इस बात पर जोर दिया कि ऐसे कठिन समय में परिवार का साथ और सकारात्मक सोच ही आपकी सबसे बड़ी दवा होती है। उन्होंने अपने प्रशंसकों को संदेश दिया कि चाहे परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, हमें अपनी जीने की इच्छा को कभी कम नहीं होने देना चाहिए। उन्होंने कहा कि "सांसें रुकने" वाला वह क्षण कठिन जरूर था, लेकिन वह अंत नहीं था।

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