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नदियों की पूजा का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक तरीका: परवीन शर्मा ने बताया कैसे पाएं 'मां' का आशीर्वाद
अक्सर हम नदियों की पूजा करते समय उनमें फूल, प्लास्टिक या अन्य सिंथेटिक सामग्री डाल देते हैं, जिससे जल प्रदूषित होता है। ज्योतिषी परवीन शर्मा के अनुसार, यह पूजा नहीं बल्कि प्रकृति का नुकसान है। उन्होंने बताया कि नदी को स्पर्श कर प्रणाम करना, सूर्य देव व पितरों को अर्घ्य देना और नदी किनारे बैठकर ध्यान लगाना ही पूजा का सही तरीका है। इस विधि से न केवल जल की पवित्रता बनी रहती है, बल्कि आत्मिक शुद्धि भी होती है।
नदियों की पूजा का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक तरीका: परवीन शर्मा ने बताया कैसे पाएं 'मां' का आशीर्वाद
Photo Credit: Instagram
- नदी को स्पर्श कर प्रणाम करना पूजा का सबसे पहला नियम है
- सूर्य देव और पितरों को जल अर्पित कर प्रार्थना करें
- नदी किनारे बैठकर मन की शुद्धि के लिए ध्यान लगाएं
भारत एक ऐसा देश है जहाँ नदियों को केवल जल का स्रोत नहीं, बल्कि 'माँ' का दर्जा दिया गया है। गंगा, यमुना, नर्मदा जैसी नदियों के तट पर साल भर पूजा-पाठ और अनुष्ठान चलते रहते हैं। लेकिन क्या हम वास्तव में इन पवित्र नदियों की पूजा सही तरीके से कर रहे हैं? प्रसिद्ध ज्योतिषी और आध्यात्मिक विशेषज्ञ परवीन शर्मा ने एक महत्वपूर्ण संदेश के माध्यम से बताया है कि हमारी अनजानी गलतियाँ कैसे इन 'जीवनदायिनी' नदियों को प्रदूषित कर रही हैं और पूजा का वास्तविक विधान क्या है।
गलत धारणा और बढ़ता प्रदूषण
परवीन शर्मा कहती हैं कि अक्सर लोग नदी किनारे जाते हैं और श्रद्धा के नाम पर प्लास्टिक की थैलियाँ, सिंथेटिक धूप, अगरबत्ती और रसायनों से रंगे फूल पानी में बहा देते हैं। हमें लगता है कि हमने पूजा संपन्न कर ली, लेकिन असल में हम उस पवित्र जल को गंदा कर रहे होते हैं। शास्त्रों के अनुसार, नदियों को प्रदूषित करना पाप की श्रेणी में आता है, न कि पुण्य की।
पूजा की सही विधि: चरण-दर-चरण मार्गदर्शिका
वीडियो में परवीन शर्मा ने नदियों के प्रति सम्मान प्रकट करने के चार मुख्य तरीके बताए हैं:
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स्पर्श और प्रणाम: नदी के पास पहुँचते ही सबसे पहले झुककर जल को स्पर्श करें और मन ही मन उन्हें प्रणाम करें। यह उस दैवीय शक्ति के प्रति आपकी कृतज्ञता का प्रतीक है।
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स्नान और मानसिक शुद्धि: यदि संभव हो तो स्नान करें, अन्यथा नदी के जल को अपने ऊपर छिड़कें। इस दौरान मन में यह भाव रखें कि "यह पवित्र जल मुझे अंदर और बाहर दोनों तरफ से शुद्ध कर रहा है।" पूजा में 'भाव' का स्थान सबसे ऊपर है।
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अर्घ्य दान: तांबे के लोटे में जल लेकर सूर्य भगवान, देवताओं और अपने पितरों को अर्घ्य दें। अपने पूर्वजों को याद करना और प्रकृति की शक्तियों को जल अर्पित करना हमारी संस्कृति की जड़ है।
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ध्यान और विसर्जन: पूजा के अंत में कुछ समय नदी के शांत किनारे पर बैठें। अपनी आँखें बंद करें और यह संकल्प लें— "जिस प्रकार यह बहता हुआ जल अंततः सागर में विलीन हो जाता है, उसी प्रकार मेरे भीतर के सभी बुरे संस्कार, विकार और कमियाँ भी परमात्मा में विलीन हो जाएं।"
नदी 'माँ' है और स्थान 'तीर्थ'
परवीन शर्मा याद दिलाती हैं कि शास्त्रों में नदियों को 'माँ' कहा गया है और उनसे जुड़े स्थानों को 'तीर्थ'। तीर्थ वह स्थान है जो आपको संसार रूपी सागर से पार लगा दे। यदि हम अपनी माँ को स्वच्छ नहीं रख सकते, तो हम उनकी पूजा के अधिकारी कैसे हो सकते हैं
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