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पेंसिल की ग्रेफाइट या करोड़ों का हीरा? अनुष्का राठौड़ से समझिए डायमंड्स के बनने का दिलचस्प विज्ञान
क्या आप ज्वेलरी खरीदने की योजना बना रहे हैं? अनुष्का राठौड़ के इस वीडियो को देखना न भूलें। उन्होंने बताया है कि 1 से 3.5 अरब साल पुराने प्राकृतिक हीरे पृथ्वी की गहराइयों में ज्वालामुखी और भीषण तापमान के बीच बनते हैं। नाइट्रोजन, ऑक्सीजन और रेडिएशन के कारण हीरों को उनके खास पीले, नारंगी और हरे रंग मिलते हैं। सही तापमान न मिलने पर ये कीमती हीरे पेंसिल में इस्तेमाल होने वाली साधारण ग्रेफाइट में बदल सकते हैं।
पेंसिल की ग्रेफाइट या करोड़ों का हीरा? अनुष्का राठौड़ से समझिए डायमंड्स के बनने का दिलचस्प विज्ञान
Photo Credit: Instagram
- प्राकृतिक हीरे 1 से 3.5 अरब साल पुराने होते हैं
- 900°C से 1300°C के बीच के तापमान पर ही हीरा बनता है
- अलग-अलग रंग के हीरों के पीछे खास प्राकृतिक और रासायनिक कारण होते हैं
शादी की शॉपिंग हो या खुद के लिए कोई कीमती ज्वेलरी खरीदनी हो, हीरे की चमक हर किसी को आकर्षित करती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस प्राकृतिक हीरे को आप अपनी उंगली में पहनते हैं, उसका इतिहास अरबों साल पुराना है? जानी-मानी कंटेंट क्रिएटर अनुष्का राठौड़ ने डी बीयर्स के एक एक्सक्लूसिव 'नेचुरल डायमंड मास्टरक्लास' में हिस्सा लिया और हीरों के बारे में कुछ ऐसे हैरान कर देने वाले तथ्य साझा किए, जिन्हें जानने के बाद ज्वेलरी को लेकर आपका नजरिया पूरी तरह बदल जाएगा।
रंग-बिरंगे हीरों के पीछे का अनूठा विज्ञान
आमतौर पर लोग हीरों को ट्रांसपेरेंट या सफेद रंग में ही देखते हैं, लेकिन प्रकृति में ये कई खूबसूरत रंगों में भी पाए जाते हैं। अनुष्का ने इनके रंगों के पीछे के वैज्ञानिक कारणों को बहुत ही आसान भाषा में समझाया है:
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पीले हीरे ये तब बनते हैं जब पृथ्वी की सतह से लगभग 100 मील नीचे हीरे के क्रिस्टल्स के साथ 'नाइट्रोजन' गैस मिल जाती है।
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हरे हीरे : इनका रंग प्राकृतिक विकिरण के कारण होता है, जब हीरे की सतह लाखों सालों तक रेडियोएक्टिव खनिजों के संपर्क में रहती है।
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बैंगनी हीरे ये बेहद दुर्लभ होते हैं और इनका संबंध हाइड्रोजन या निकेल-नाइट्रोजन से जुड़ी बनावट की कमियों से होता है।
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नारंगी हीरे ऑक्सीजन से जुड़ी कमियों के कारण इन हीरों को एक खूबसूरत और चमकदार वॉर्म ग्लो मिलता है।
यहाँ तक कि कच्चे रूप में दिखने वाले ट्रांसपेरेंट हीरे भी एक जैसे नहीं होते; कुछ पूरी तरह साफ होते हैं तो कुछ धुंधले या क्लाउडी नजर आते हैं। दिलचस्प बात यह है कि सभी प्राकृतिक हीरों की शुरुआत एक अष्टकोणीय क्रिस्टल आकार से होती है जो समय के साथ बदलता जाता है।
ज्वालामुखी, तापमान और पेंसिल की ग्रेफाइट का कनेक्शन
अनुष्का बताती हैं कि प्रकृति में मिलने वाले ये हीरे करीब 1 से 3.5 अरब साल पुराने हैं। ये पृथ्वी की गहराई में अत्यधिक दबाव और 900°C से 1300°C के बीच के कड़े तापमान पर बनते हैं। यदि तापमान या परिस्थितियां इसके अनुकूल न हों, तो वह कार्बन हीरे के बजाय ग्रेफाइट में बदल जाता है वही ग्रेफाइट जिसका इस्तेमाल हम अपनी लिखने वाली पेंसिल की लीड में करते हैं। इन गहराईयों में बने हीरों को प्राचीन काल में हुए भीषण ज्वालामुखी विस्फोट पृथ्वी की सतह के करीब लेकर आए थे।
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