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उदयन आध्ये ने बताया: म्यूचुअल फंड से ₹12 लाख तक की कमाई पर कैसे बचा सकते हैं टैक्स

फाइनेंस इंफ्लुएंसर उदयन आध्ये ने म्यूचुअल फंड निवेश से जुड़ी एक स्मार्ट रणनीति बताई है, जिसके जरिए निवेशक सालाना ₹12 लाख तक की आय पर टैक्स बचा सकते हैं। उनका कहना है कि नियमित आय के लिए आमतौर पर इस्तेमाल होने वाले SWP (Systematic Withdrawal Plan) की बजाय IDCW (Income Distribution cum Capital Withdrawal) कुछ मामलों में ज्यादा टैक्स-एफिशिएंट विकल्प साबित हो सकता है। यदि किसी व्यक्ति की कुल सालाना आय धारा 87A के तहत मिलने वाली रिबेट सीमा के भीतर रहती है, तो उसकी टैक्स देनदारी शून्य हो सकती है।

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उदयन आध्ये ने साझा की म्यूचुअल फंड से टैक्स बचाने वाली आय की रणनीति

Photo Credit: Instagram

ख़ास बातें
  • IDCW रणनीति से सालाना ₹12 लाख तक की आय पर टैक्स बचाया जा सकता है
  • धारा 87A की रिबेट से म्यूचुअल फंड आय पर टैक्स देनदारी शून्य हो सकती है
  • IDCW भुगतान NAV को प्रभावित करते हैं और SWP की तुलना में कम निश्चित होते

फाइनेंस इंफ्लुएंसर उदयन आध्ये ने एक ऐसी निवेश रणनीति साझा की है, जिसके जरिए निवेशक सही योजना बनाकर म्यूचुअल फंड से सालाना ₹12 लाख तक की आय प्राप्त कर सकते हैं और कुछ परिस्थितियों में उन पर कोई टैक्स भी नहीं देना पड़ सकता। आमतौर पर नियमित आय के लिए लोग सिस्टमेटिक विदड्रॉल प्लान (SWP) का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन उदयन का कहना है कि Income Distribution cum Capital Withdrawal (IDCW) कुछ निवेशकों के लिए अधिक टैक्स-एफिशिएंट विकल्प साबित हो सकता है।

SWP और IDCW में क्या अंतर है?

ज्यादातर निवेशक नियमित आय के लिए SWP चुनते हैं। इसमें हर निकासी को कैपिटल गेन माना जाता है, जिस पर होल्डिंग पीरियड और मुनाफे के आधार पर टैक्स लग सकता है। वहीं IDCW के तहत मिलने वाली राशि को सामान्य आय (Income) माना जाता है और उसी के अनुसार टैक्स लगाया जाता है। टैक्स प्लानिंग के नजरिए से यह अंतर काफी महत्वपूर्ण हो सकता है।

कैसे हो सकता है जीरो टैक्स?

उदयन के अनुसार यह रणनीति आयकर अधिनियम की धारा 87A के तहत मिलने वाली टैक्स रिबेट का लाभ उठाती है। यदि किसी व्यक्ति की कुल वार्षिक आय, जिसमें IDCW से मिलने वाली राशि भी शामिल हो, ₹12 लाख तक रहती है, तो मौजूदा नियमों के अनुसार उसकी टैक्स देनदारी शून्य हो सकती है। यही कारण है कि जिन लोगों की अन्य आय सीमित है, उनके लिए IDCW एक आकर्षक विकल्प बन सकता है।

ध्यान रखने वाली जरूरी बातें

हालांकि IDCW सुनने में फायदेमंद लगता है, लेकिन इसके कुछ नुकसान भी हैं। SWP की तरह इसमें नियमित और तय राशि की गारंटी नहीं होती। IDCW का भुगतान फंड के प्रदर्शन पर निर्भर करता है। इसके अलावा हर भुगतान के बाद फंड का नेट एसेट वैल्यू (NAV) घट जाता है, जिसका असर कुल रिटर्न पर पड़ सकता है।

एक और महत्वपूर्ण पहलू TDS (Tax Deducted at Source) है। यदि किसी AMC से मिलने वाली IDCW आय ₹5,000 से अधिक हो जाती है, तो उस पर TDS काटा जा सकता है। हालांकि यदि निवेशक की अंतिम टैक्स देनदारी शून्य है, तो वह आयकर रिटर्न भरते समय इस राशि का रिफंड क्लेम कर सकता है।

किसके लिए है यह रणनीति?

यह तरीका खास तौर पर रिटायर्ड लोगों, गृहिणियों या उन व्यक्तियों के लिए उपयोगी हो सकता है जिनकी नियमित कर योग्य आय बहुत कम है या नहीं है। सही योजना के साथ IDCW उनके लिए अतिरिक्त टैक्स बोझ बढ़ाए बिना आय का एक स्रोत बन सकता है।

सोच-समझकर करें इस्तेमाल

उदयन आध्ये का मुख्य संदेश यह है कि IDCW कोई जादुई उपाय नहीं, बल्कि एक वित्तीय साधन है। सही परिस्थितियों में इसका उपयोग टैक्स बचाने में मदद कर सकता है, लेकिन इसकी कार्यप्रणाली को समझे बिना केवल टैक्स बचाने के उद्देश्य से इसे चुनना लंबे समय में निवेश के लक्ष्यों को प्रभावित कर सकता है।

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