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अंकुर वारिकू से जानें दशरथ मांझी का वो अटूट संकल्प, जिसने 22 साल तक अकेले पहाड़ को झुकने पर मजबूर कर दिया
अंकुर वारिकू से जानें दशरथ मांझी की वो प्रेरक गाथा, जहाँ उन्होंने पत्नी की याद में 22 साल तक अकेले पहाड़ काटकर रास्ता बनाया और असंभव को संभव कर दिखाया।
अंकुर वारिकू से जानें दशरथ मांझी का वो अटूट संकल्प
Photo Credit: Instagram
- अंकुर वारिकू ने सुनाई दशरथ मांझी के अटूट प्रेम की कहानी
- अपनी पत्नी के प्रेम में पहाड़ का सीना चीर दिया
- दशरथ मांझी ने 22 साल अकेले मेहनत कर पहाड़ काट डाला
लेखक अंकुर वारिकू अक्सर ऐसी कहानियां साझा करते हैं जो हमारे सोचने का नज़रिया बदल देती हैं। हाल ही में उन्होंने एक ऐसी रीयल-लाइफ कहानी सुनाई जो साबित करती है कि इंसान की इच्छाशक्ति के आगे प्रकृति भी घुटने टेक देती है। यह कहानी है 'द माउंटेन मैन' दशरथ मांझी की।
अंकुर वारिकू बताते हैं: 1959 का वो मनहूस दिन
अंकुर बताते हैं कि साल 1959 में बिहार के गया जिले के एक छोटे से गाँव में रहने वाले दशरथ मांझी की पत्नी, फाल्गुनी देवी, उनके लिए दोपहर का खाना लेकर जा रही थीं। गाँव और शहर के बीच एक विशाल पहाड़ खड़ा था। पहाड़ पार करते समय फाल्गुनी का पैर फिसल गया और वे बुरी तरह ज़ख्मी हो गईं। पास में कोई अस्पताल नहीं था और पहाड़ की वजह से रास्ता बहुत लंबा था। 70 किलोमीटर दूर अस्पताल ले जाते समय रास्ते में ही उनकी मौत हो गई।
दर्द जब संकल्प बन गया
अंकुर वारिकू के अनुसार, दशरथ मांझी इस नुकसान से टूट सकते थे, लेकिन उन्होंने इस दर्द को एक मिशन में बदल दिया। अगली सुबह, वे केवल एक हथौड़ा और छेनी लेकर उस पहाड़ के सामने खड़े हो गए। उन्होंने संकल्प लिया कि जो दुख उन्होंने झेला, वो उनके गाँव का कोई और व्यक्ति न झेले।
22 साल का 'अकेला' संघर्ष
अंकुर इस बात पर जोर देते हैं कि दशरथ मांझी के पास न कोई मशीन थी, न कोई इंजीनियर और न ही सरकार का सहारा। लोगों ने उन्हें 'पागल' कहा और उनका मज़ाक उड़ाया, लेकिन उन्होंने किसी की नहीं सुनी। 1960 से 1982 तक, यानी पूरे 22 साल वे अकेले उस पहाड़ को काटते रहे।
अंकुर वारिकू का मैसेज: जब 55 किमी सिमटकर 15 किमी रह गया
दशरथ मांझी की मेहनत रंग लाई और उन्होंने पहाड़ के बीचों-बीच 360 फुट लंबा और 30 फुट चौड़ा रास्ता बना दिया। इस रास्ते ने अस्पताल की दूरी को 55 किलोमीटर से घटाकर मात्र 15 किलोमीटर कर दिया।
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