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क्यों टूट रहे हैं आज के आधुनिक रिश्ते? विवाह और तलाक पर सद्गुरु के ये विचार बदल देंगे आपका नजरिया

क्या आज की युवा पीढ़ी शादी और कमिटमेंट से दूर भाग रही है? ईशा फाउंडेशन के संस्थापक सद्गुरु ने आधुनिक दौर में बढ़ते तलाक और कमजोर होते रिश्तों के मनोवैज्ञानिक कारणों को डिकोड किया है। सद्गुरु के अनुसार, आज जब युवा आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं, तो विवाह की पुरानी परिभाषाएं बदल चुकी हैं। रिश्तों में बढ़ती अत्यधिक उम्मीदें और लेनदेन की मानसिकता ही आज के कपल्स के बीच अलगाव की सबसे बड़ी वजह बन रही है, जिसे केवल आंतरिक समझ और स्वीकार्यता से ही ठीक किया जा सकता है।

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विवाह और तलाक पर सद्गुरु के ये विचार बदल देंगे आपका नजरिया

Photo Credit: Instagram

ख़ास बातें
  • शादी खुशी निचोड़ने की जगह नहीं है
  • विवाह और कमिटमेंट पर सद्गुरु के इन कड़वे व सच्चे विचारों को जरूर सुनें
  • आज का युवा शादी से क्यों कतरा रहा है और क्यों बढ़ रहे हैं तलाक

एक दौर था जब शादी को सात जन्मों का अटूट बंधन माना जाता था और लोग किसी भी परिस्थिति में इसे निभाते थे। लेकिन आज की 'जेन-जी' और मिलेनियल्स पीढ़ी के बीच तलाक की बढ़ती दर और शादी से दूरी बनाने का चलन कुछ और ही कहानी बयां करता है। आध्यात्मिक गुरु सद्गुरु ने इस सामाजिक बदलाव को बहुत ही व्यावहारिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझाया है। उनका मानना है कि युवाओं का कमिटमेंट पर सवाल उठाना पूरी तरह गलत नहीं है, बल्कि यह इस बात का संकेत है कि विवाह के पुराने मापदंड अब अप्रासंगिक हो चुके हैं।

सुरक्षा बनाम भावनात्मक जुड़ाव 

सद्गुरु बताते हैं कि पारंपरिक रूप से विवाह की बुनियाद मुख्य रूप से सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा पर टिकी थी, विशेष रूप से महिलाओं के लिए। समाज में अकेले रहना कठिन था, इसलिए शादी एक सामाजिक अनिवार्यता थी। लेकिन आज का युवा, विशेषकर महिलाएं, आर्थिक रूप से पूरी तरह स्वतंत्र और आत्मनिर्भर हैं।

जब जीवन में भौतिक सुरक्षा की चिंता खत्म हो जाती है, तो इंसान की तलाश 'भावनात्मक और आध्यात्मिक पूर्णता' की तरफ बढ़ती है। आज के युवा किसी ऐसे रिश्ते में बंधकर नहीं रहना चाहते जो उनके व्यक्तिगत विकास को रोके या जहां उन्हें अपनी आजादी से समझौता करना पड़े। इसलिए, जब रिश्तों में वह गहराई नहीं मिलती, तो वे कमिटमेंट पर सवाल उठाने लगते हैं।

उम्मीदों का भारी बोझ और 'लेनदेन' की मानसिकता

सद्गुरु के अनुसार, आधुनिक विवाहों के असफल होने की सबसे बड़ी वजह यह है कि रिश्ते अब 'प्यार और सेवा' के बजाय 'लेनदेन'  बन गए हैं। लोग शादी में यह सोचकर कदम रखते हैं कि "सामने वाला मुझे क्या दे सकता है? वह मुझे कितनी खुशी दे सकता है?"

जब आप किसी से लगातार सुख और खुशी निचोड़ने की कोशिश करते हैं, तो वह रिश्ता बोझ बन जाता है। सद्गुरु कहते हैं, "विवाह कोई ऐसी जगह नहीं है जहाँ आप खुशी खोजने जाते हैं। विवाह तब होना चाहिए जब आप अपने भीतर पहले से ही खुश और पूर्ण हों, और उस खुशी को किसी के साथ साझा करना चाहते हों।" जब उम्मीदें यथार्थ से परे हो जाती हैं, तो कड़वाहट बढ़ती है और बात तलाक तक पहुँच जाती है।

कमिटमेंट का असली मतलब क्या है? 

तलाक को लेकर सद्गुरु एक बहुत ही संतुलित विचार रखते हैं। उनका कहना है कि यदि दो लोग किसी भी तरह एक-दूसरे के साथ खुश नहीं रह पा रहे हैं और उनका साथ रहना केवल एक मानसिक प्रताड़ना बन चुका है, तो एक गरिमापूर्ण अलगाव  उस कड़वाहट भरे रिश्ते को खींचने से कहीं बेहतर है।

लेकिन वे युवाओं को सचेत भी करते हैं कि बार-बार रिश्ते बदलना मानसिक शांति को भंग करता है। सच्चा कमिटमेंट किसी कानूनी दस्तावेज या सामाजिक भय से पैदा नहीं किया जा सकता। कमिटमेंट का अर्थ है 'समावेशिता' यानी जब आप किसी अन्य व्यक्ति को अपनी ही तरह कमियों और खूबियों के साथ स्वीकार कर लेते हैं। जब तक आप अपने अहंकार को थोड़ा पीछे छोड़कर सामने वाले को अपने जीवन में जगह नहीं देंगे, तब तक कोई भी आधुनिक व्यवस्था या काउंसलिंग आपके रिश्तों को टूटने से नहीं बचा सकती।

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