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- बंटवारे के दर्द से निकली भारत की पसंदीदा डिश, शेफ रणवीर बरार ने बताई दाल मखनी के जन्म की कहानी
बंटवारे के दर्द से निकली भारत की पसंदीदा डिश, शेफ रणवीर बरार ने बताई दाल मखनी के जन्म की कहानी
क्या आप अपनी पसंदीदा 'दाल मखनी' का इतिहास जानते हैं? मशहूर शेफ रणवीर बरार ने बताया कि इसे कुंदन लाल जग्गी, ठाकुर दास मग्गू और कुंदन लाल गुजराल ने बनाया था। ये तीनों लाहौर में साथ काम करते थे लेकिन भारत-पाकिस्तान बंटवारे के दौरान बिछड़ गए। बाद में दिल्ली के एक रिफ्यूजी कैंप में इनकी अचानक मुलाकात हुई और इन्होंने 'मोती महल' रेस्टोरेंट खोला, जहां भारत की पहली और असली 'दाल मखनी' का जन्म हुआ।
बंटवारे के दर्द से निकली भारत की पसंदीदा डिश, शेफ रणवीर बरार ने बताई 'दाल मखनी' के जन्म की कहानी
Photo Credit: Instagram
- बंटवारे के दर्द से निकली भारत की पसंदीदा डिश
- लाहौर से दिल्ली तक का सफर
- शेफ रणवीर बरार ने बताई दाल मखनी के जन्म की कहानी
भारत में शायद ही कोई ऐसा रेस्टोरेंट या शादी का मेन्यू हो, जहां दाल मखनी शामिल न हो। रेस्टोरेंट में जाते ही सबसे पहला ऑर्डर अक्सर इसी क्रीमी और स्वादिष्ट दाल का होता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आज हमारी और आपकी खाने की टेबल की शान बनने वाली यह दाल मखनी आखिर आई कहां से? मशहूर सेलिब्रिटी शेफ रणवीर बरार ने हाल ही में एक वीडियो में दाल मखनी की एक बेहद भावुक और रोचक कहानी साझा की है, जो सीधे भारत के बंटवारे से जुड़ी है।
लाहौर के तीन दोस्तों की कहानी
शेफ रणवीर बरार बताते हैं कि दाल मखनी के आविष्कार का पूरा श्रेय तीन दोस्तों को जाता है- कुंदन लाल जग्गी, ठाकुर दास मग्गू और कुंदन लाल गुजराल। साल 1947 से पहले, ये तीनों दोस्त अविभाजित भारत के लाहौर में एक साथ काम करते थे। वे एक भोजनालय में रोटियां बनाने, मसाले कूटने और खाना पकाने का काम किया करते थे। उनका जीवन सामान्य चल रहा था, लेकिन फिर 1947 का बंटवारा हुआ।
बंटवारे का दर्द और रिफ्यूजी कैंप में पुनर्मिलन
बंटवारे की त्रासदी ने इन तीनों दोस्तों को एक-दूसरे से अलग कर दिया। सब कुछ पीछे छूट गया और वे जान बचाकर भारत आ गए। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। शेफ बरार बताते हैं कि बंटवारे के बाद दिल्ली के एक रिफ्यूजी कैंप में भटकते हुए, इन तीनों दोस्तों की अचानक एक-दूसरे से मुलाकात हो गई।
ऐसे हुई मोती महल और दाल मखनी की शुरुआत
रिफ्यूजी कैंप में मिलने के बाद, इन तीनों ने फैसला किया कि अगर दिल्ली में एक शरणार्थी के रूप में नई जिंदगी शुरू करनी है, तो वही काम करना होगा जो वे लाहौर में अच्छे से किया करते थे। इसी सोच के साथ उन्होंने दिल्ली में एक नया रेस्टोरेंट खोला, जिसका नाम रखा गया- मोती महल।
इसी रेस्टोरेंट में उन्होंने अपनी पुरानी यादों और हुनर को मिलाते हुए कुछ ऐसी डिशेज बनाईं, जो वे पहले बनाते थे। इसी प्रयोग के दौरान एक ऐसी डिश का जन्म हुआ, जो आज तक हमारी और आपकी बातचीत और थाली का अहम हिस्सा है- दाल मखनी।
शेफ रणवीर बरार कहते हैं कि असली और ओरिजिनल दाल मखनी दरअसल बंटवारे के बाद मिले उन तीन दोस्तों के संघर्ष और खुद को साबित करने के जज्बे का नतीजा है। यह सिर्फ एक डिश नहीं, बल्कि 'मोती महल' और उन शरणार्थियों की कहानी है जिन्होंने अपना सब कुछ खोने के बाद भी एक नया इतिहास रच दिया।
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